संत कबीर दास का जीवन परिचय, दोहे, कविताये 

कबीर दास जी भारत के महान कवी और संत रहे है। वे हिंदी साहित्य के निपुण विद्वान् और भक्तिकाल के महान प्रवर्तक रहे है। इनके दोहे और कविताये लोगो के बीच काफी लोकप्रिय है। उनके लेखन को सिख ग्रन्थ आदि ग्रन्थ में भी देखा जा सकता ह। कबीर दास जी किसी एक धर्म के प्रवर्तक नहीं थे। वो सिर्फ ईश्वर में विस्वास करते थे। उनके लिए सर्वोच्च इस्वर से ज्यादा कोई नहीं था।

कबीर दास जी का जन्म काशी में हुआ था। समाज में फैली धार्मिक कुरूतियो की उन्होंने कड़ी निंदा की थी और लोगो को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। कबीर दास जी ने अपनी रचनाये में हिंदी, पंजाबी, हरियाणवी, अवधि, ब्रज, खड़ी बोली और राजस्थानी भाषा का मिश्रण किया है। सिख, मुस्लिम, हिन्दू तीनो धर्मो में उनका प्रभाव देखने को मिलता है। उनके बारे में पूरी जानकारी इस लेख के माध्यम से दी गई ह। आप निचे के सेक्शन में पढ़ सकते है।

भारत के महान संत और आध्यात्मिक कवि कबीर दास का जन्म वर्ष 1440 में हुआ था। इस्लाम के अनुसार ‘कबीर’ का अर्थ महान होता है। इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि उनके असली माता-पिता कौन थे लेकिन ऐसा माना जाता है कि उनका लालन-पालन एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनको नीरु और नीमा (रखवाला) के द्वारा वाराणसी के एक छोटे नगर से पाया गया था। वाराणसी के लहरतारा में संत कबीर मठ में एक तालाब है जहाँ नीरु और नीमा नामक एक जोड़े ने कबीर को पाया था।ये शांति और सच्ची शिक्षण की महान इमारत है जहाँ पूरी दुनिया के संत वास्तविक शिक्षा की खातिर आते है।कबीर के माँ-बाप बेहद गरीब और अनपढ़ थे लेकिन उन्होंने कबीर को पूरे दिल से स्वीकार किया और खुद के व्यवसाय के बारे में शिक्षित किया। उन्होंने एक सामान्य गृहस्वामी और एक सूफी के संतुलित जीवन को जीया।

Kabir dasDetails
उपनाम कबीरदास, कबीर परमेश्वर, कबीर साहेब
कार्य सामाजिक बुराइया दूर करना 
गुरुरामानंद जी
जन्म दिनांक 1440 ईस्वी
जन्म स्थान काशी 
दोहे निचे दिए गए है। अर्थ सहित 
पत्नी का नाम लोई
पिता का नामनीरू जुलाहे
पूरा नाम कबीरदास
बच्चो के नामकमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)

कबीर दास जी का जीवन सफर

Kabir Das ji के जन्म के बारे में विद्वानों का मत ये है की कबीर दास जी का जन्म नहीं हुआ। वो अवतरित हुए थे। वो हर युग में अपने सतलोक से धरती पर अवतरित होते है। उनके माता पिता ने नाम से सम्बोधित निरु जुलाहे और नीमा को कबीर दास जी लहरतारा के तालाब में एक कमल के पुष्प पर मिले थे।

ज्येष्ठ पूर्णिमा के सुबह के समय ( 1398 (संवत 1455) को कबीर दास जी निरु और नीमा को मिले थे। इन्होने ही इनका लालन पालन किया था। ये परिवार बहुत ही गरीब और निरक्षर था। और अपना गुजारा कर थे। उन्होंने ही कबीर दास जी को अपनी औलाद की तरह पाला है।

कबीर दास जी के गुरु

Kabir Das ji का भरण पोषण जिस परिवार में हुआ था वो बेहद ही गरीब परिवार था। और उनको दिन में दो टाइम का खाना मिल जाना ही बहुत बड़ी बात थी। इसलिए शिक्षा के बारे सोचना तो बहुत दूर की बात है। कबीर दास जी कभी बढ़ नहीं पाए। लेकिन कबीर दास जी को पहले से ही हर तरह का ज्ञान था। काशी के प्रसिद्द विद्वान् रमांनंद जी के आश्रम में उन्होंने पढ़ने के लिए काफी कोशिश की

लेकिन उनको सफलता नहीं मिली। उनकी गरीबी हर जगह उनके लिए बाधा उत्पन्न कर रही थी।और उनके समय में जात पात उच्च नीच बहुत ज्यादा था। ब्राह्मण लोगो का दबदबा था। एक बार की घटना के है कबीर दास जी ने देखा की आचार्य रामानंद सुबह के सभी जरुरी कामो के लिए घाट पर जरूर जाते है। तो कबीर दास जी ने नदी के घाट पर चारो और बाड़ लगा थी

कबीर दास जी का धर्म और समाज

Kabir Das ji के लिए कोई धर्म सर्वोपरि नहीं था। उनके लिए सभी धर्म एक समान थे। इसी वजह से ही उनको कई बार मुस्लिम और हिन्दू लोगो की उपेक्षा का सामना करना पड़ा था। उनका लक्ष्य समाज में फैली ऊंच नीच , जात पात की सामाजिक कुरूतियो को दूर करना था। और लोगो को सत्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना था। उनके प्रवचन हमेशा से ही लोगो को इन सब बुराइयों से दूर रहने के बारे शिक्षा देते है

संत कबीर दास जीवन परिचय

लोई पहले इनकी पत्नी थी उसके बाद उन्होंने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया था कबीर दास जी एक प्रसिद्ध संत के साथ-साथ धार्मिक और सज्जन व्यक्ति थे। उन्होंने समाज की कुरीतियों असंगत प्रथाओं धर्म  के नाम पर ढोंग करने वाले ढोंगी मूर्ति पूजा आदि का कड़ा विरोध किया है और समाज को जागरूक  करने का महत्व प्रयास किया है इस तरह कबीर दास जी ने अपने जीवन में अनेकों उपलब्धियां हासिल की है सबसे महत्वपूर्ण  उपलब्धियां हासिल की है जिसमें से संत इनकी महत्वपूर्ण उपाधि है जो इनके नाम के आगे लगाई जाती है इस तरह उन्होंने अपने जीवन व्यतीत किया उसके बाद 1518 के लगभग में इनकी मृत्यु हो गई थी।

रचनाएं

  • साखी 
  • रमैनी
  • सबद

भाव पक्ष

कबीर दास जी संत के साथ-साथ ब्रह्मा जी के भी उपासक थे तथा इनकी कविताओं में प्रेम और भक्ति भी स्पष्ट दिखाई देती है इन्होंने अपनी रचनाओं में कहा है कि घर है तो प्रेम है इससे उनके प्रेम भाव का भी वर्णन होता है। इसके साथ-साथ उन्होंने समाज के सुधार के लिए भी महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं जो उनके युग के किसी कवि ने यह कार्य नहीं किया है उन्होंने समाज को समृद्ध कुरीतियों को खत्म करने तथा अंधविश्वास को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

कला पक्ष

कबीर जी की भाषासरल तो थी लेकिन उन्होंने अपनी भाषा में साधारण भाषा जो आम तौर पर बोलचाल में बोली जाती है उसका प्रयोग किया है इसलिए इनकी भाषा सरल और आसान थी  लेकिन  अपरिष्कृत थीइन्होंने राजस्थानी पंजाबी उर्दू फारसी आदि भाषाओं के शब्दों का उपयोग भी किया है।

जिससे इनकी भाषा में विचित्र ता का गुण दिखाई देता है इन्हें अपने भाव को प्रकट का सार्थक विद्वान था तथा इनकी सैलरी सरल एवं सहज थी तथा कबीर जी अपने भाव को प्रकट करने में सक्षम थे इसके अलावा इन्होंने  रूपा उपमा अन्योक्ति उत्प्रेक्षा जैसे अलंकारों के साथ-साथ इनकी चौपाई में छंदों का भी उपयोग मिलता है।

साहित्य में स्थान

कबीर दास जी एक महान संत थे तथा उन्होंने समाज सुधार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए हैं समाज की कुरीतियां अंधविश्वास मूर्ति पूजा आदि का इन्होंने घोर विरोध किया है इसलिए कबीर दास जी को प्रमुख समाज सुधारक के रूप में जाने जाते हैंतथा हिंदी साहित्य में इन्हें संत कबीर जी के नाम से जाना जाता है। 

सिद्धपीठ कबीरचौरा मठ मुलगड़ी और उसकी परंपरा

कबीरचौरा मठ मुलगड़ी संत-शिरोमणि कबीर दास का घर, ऐतिहासिक कार्यस्थल और ध्यान लगाने की जगह है। वे अपने प्रकार के एकमात्र संत है जो “सब संतन सरताज” के रुप में जाने जाते है। ऐसा माना जाता है कि जिस तरह संत कबीर के बिना सभी संतों का कोई मूल्य नहीं उसी तरह कबीरचौरा मठ मुलगड़ी के बिना मानवता का इतिहास मूल्यहीन है। कबीरचौरा मठ मुलगड़ी का अपना समृद्ध परंपरा और प्रभावशाली इतिहास है। ये कबीर के साथ ही सभी संतों के लिये साहसिक विद्यापीठ है ।

मध्यकालीन भारत के भारतीय संतों ने इसी जगह से अपनी धार्मिक शिक्षा प्राप्त की थी। मानव परंपरा के इतिहास में ये साबित हुआ है कि गहरे चिंतन के लिये हिमालय पर जाना जरुरी नहीं है बल्कि इसे समाज में रहते हुए भी किया जा सकता है।

ऐतिहासिक कुआँ

कबीर मठ में एक ऐतिहासिक कुआँ है, जिसके पानी को उनकी साधना के अमृत रस के साथ मिला हुआ माना जाता है। दक्षिण भारत से महान पंडित सर्वानंद के द्वारा पहली बार ये अनुमान लगाया गया था। वो यहाँ कबीर से बहस करने आये थे और प्यासे हो गये। उन्होंने पानी पिया और कमाली से कबीर का पता पूछा। कमाली नें कबीर के दोहे के रुप में उनका पता बताया।“कबीर का शिखर पर, सिलहिली गालपाँव ना टिकाई पीपील का, पंडित लड़े बाल”वे कबीर से बहस करने गये थे लेकिन उन्होंने बहस करना स्वीकार नहीं किया और सर्वानंद को लिखित देकर अपनी हार स्वीकार की। सर्वानंद वापस अपने घर आये और हार की उस स्वीकारोक्ति को अपने माँ को दिखाया और अचानक उन्होंने देखा कि उनका लिखा हुआ उल्टा हो चुका था।

वो इस सच्चाई से बेहद प्रभावित हुए और वापस से काशी के कबीर मठ आये बाद में कबीर दास के अनुयायी बने। वे कबीर से इस स्तर तक प्रभावित थे कि अपने पूरे जीवन भर उन्होंने कभी कोई किताब नहीं छुयी। बाद में, सर्वानंद आचार्य सुरतीगोपाल साहब की तरह प्रसिद्ध हुए। कबीर के बाद वे कबीर मठ के प्रमुख बने।कैसे पहुँचे:सिद्धपीठ कबीरचौरा मठ मुलगड़ी वाराणसी के रुप में जाना जाने वाला भारत के प्रसिद्ध सांस्कृतिक शहर में स्थित है। कोई भी यहाँ हवाईमार्ग, रेलमार्ग या सड़कमार्ग से पहुँच सकता है। ये वाराणसी हवाई अड्डे से 18 किमी और वाराणसी रेलवे स्टेशन से 3 किमी की दूरी पर स्थित है।

समाधि मंदिर:

समाधि मंदिर वहाँ बना है जहाँ कबीर दास अक्सर अपनी साधना किया करते थे। सभी संतों के लिये यहाँ समाधि से साधना तक की यात्रा पूरी हो चुकी है। उस दिन से, ये वो जगह है जहाँ संत अत्यधिक ऊर्जा के बहाव को महसूस करते है। ये एक विश्व प्रसिद्ध शांति और ऊर्जा की जगह है। ऐसा माना जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद लोग उनके शरीर के अंतिम संस्कार को लेकर झगड़ने लगे। लेकिन जब समाधि कमरे के दरवाजे को खोला गया, तो वहाँ केवल दो फूल थे जो अंतिम संस्कार के लिये उनके हिन्दू और मुस्लिम अनुयायियों के बीच बाँट दिया गया।

मिर्ज़ापुर के मोटे पत्थर से समाधि मंदिर का निर्माण किया गया है।कबीर चबूतरा पर बीजक मंदिर:ये जगह कबीर दास का कार्यस्थल होने के साथ साधना स्थल भी था। ये वो जगह है जहाँ कबीर ने अपने अनुयायियों को भक्ति, ज्ञान, कर्म और मानवता की शिक्षा दी।

इस जगह का नाम रखा गया कबीर चबूतरा। बीजक कबीर दास की महान रचना थी इसी वजह से कबीर चबूतरा का नाम बीजक मंदिर रखा गया।कबीर तेरी झोपड़ी, गलकट्टो के पास।जो करेगा वो भरेगा, तुम क्यों होत उदास।

कबीर दास: एक हिन्दू या मुस्लिम

माना जाता है कि कबीर दास के मृत्यु के बाद हिन्दू और मुस्लिमों ने उनके शरीर को पाने के लिये अपना-अपना दावा पेश किया। दोनों धर्मों के लोग अपने रीति-रिवाज़ और परंपरा के अनुसार कबीर का अंतिम संस्कार करना चाहते थे। हिन्दुओं ने कहा कि वो हिन्दू थे इसलिये वे उनके शरीर को जलाना चाहते है जबकि मुस्लिमों ने कहा कि कबीर मुस्लिम थे इसलिये वो उनको दफनाना चाहते है।

कबीर दास की मृत्यु

15 शताब्दी के सूफी कवि कबीर दास के बारे में ऐसा माना जाता है कि उन्होंने अपने मरने की जगह खुद से चुनी थी, मगहर, जो लखनउ शहर से 240 किमी दूरी पर स्थित है। लोगों के दिमाग से मिथक को हटाने के लिये उन्होंने ये जगह चुनी थी उन दिनों, ऐसा माना जाता था कि जिसकी भी मृत्यु मगहर में होगी वो अगले जन्म में बंदर बनेगा और साथ ही उसे स्वर्ग में जगह नहीं मिलेगी।

कबीर दास की रचनाएँ

कबीर के द्वारा लिखी गयी पुस्तकें सामान्यत: दोहा और गीतों का समूह होता था। संख्या में उनका कुल कार्य 72 था और जिसमें से कुछ महत्पूर्ण और प्रसिद्ध कार्य है जैसे रक्त, कबीर बीजक, सुखनिधन, मंगल, वसंत, शब्द, साखी, और होली अगम।कबीर की लेखन शैली और भाषा बहुत सुंदर और साधारण होती है। उन्होंने अपना दोहा बेहद निडरतापूर्वक और सहज रुप से लिखा है जिसका कि अपना अर्थ और महत्व है। कबीर ने दिल की गहराईयों से अपनी रचनाओं को लिखा है। उन्होंने पूरी दुनिया को अपने सरल दोहों में समेटा है। उनका कहा गया किसी भी तुलना से ऊपर और प्रेरणादायक है।

कबीर दास जी की मुख्य रचनाएं 

साखी– इसमें ज्यादातर कबीर दास जी की शिक्षाओं और सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है।सबद –कबीर दास जी की यह सर्वोत्तम रचनाओं में से एक है, इसमें उन्होंने अपने प्रेम और अंतरंग साधाना का वर्णन खूबसूरती से किया है।

रमैनी- इसमें कबीरदास जी ने अपने कुछ दार्शनिक एवं रहस्यवादी विचारों की व्याख्या की है। वहीं उन्होंने अपनी इस रचना को चौपाई छंद में लिखा है।कबीर दास जी की अन्य रचनाएं:

  • साधो, देखो जग बौराना – कबीर
  • कथनी-करणी का अंग -कबीर
  • करम गति टारै नाहिं टरी – कबीर
  • चांणक का अंग – कबीर
  • नैया पड़ी मंझधार गुरु बिन कैसे लागे पार – कबीर
  • मोको कहां – कबीर
  • रहना नहिं देस बिराना है – कबीर
  • दिवाने मन, भजन बिना दुख पैहौ – कबीर
  • राम बिनु तन को ताप न जाई – कबीर
  • हाँ रे! नसरल हटिया उसरी गेलै रे दइवा – कबीर
  • हंसा चलल ससुररिया रे, नैहरवा डोलम डोल – कबीर
  • अबिनासी दुलहा कब मिलिहौ, भक्तन के रछपाल – कबी

इसके अलावा कबीर दास ने कई और महत्वपूर्ण कृतियों की रचनाएं की हैं, जिसमें उन्होंने अपने साहित्यिक ज्ञान के माध्यम से लोगों का सही मार्गदर्शन कर उन्हें अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है।

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