आर्यभट्ट का जीवन परिचय

आर्यभट्ट वे इंसान थे जिसने पांचवी सदी में गणितीय और खगोलीय ज्ञान को। पहली बार चरणबद्ध तरीके से, किसी एक जगह एकत्रित किया। वह भी केवल 23 साल की उम्र में। उनके विचारों का अरबी में अनुवाद किया गया। जिन्होंने इस्लामी खगोल वैज्ञानियों और गणितज्ञों को खासा प्रभावित किया।

आर्यभट्ट की जीवनी एक नजर में

आर्यभट्ट का जन्म

महान गणितज्ञ आर्यभट्ट जी का जन्म के बारे में इतिहासकारों के अलग-अलग मत है। कई इतिहासकार उनका जन्म 476 ईसवी में कुसुमपुर ( आधुनिक पटना) में बताते हैं, तो कई इतिहासकार उनका जन्म महाराष्ट्र के अश्मक में बताते हैं। वहीं ऐसा माना जाता है कि आर्यभट्ट पटना की मुख्य नालंदा यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए थे।

आर्यभट्ट की शिक्षा

इस संबंध में इतिहासकारों के पास पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि आर्यभट्ट अपने जीवनकाल में किसी समय उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए कुसुमपुर गए होंगे, जो उस समय उच्च शिक्षा के लिए एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय था।

आर्यभटिय

यह आर्यभट्ट का एक गणितीय कार्य है, जिसमें अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति का विस्तृत विवरण है। इसके अलावा इसमें निरंतर भिन्न [निरंतर अंश], द्विघात समीकरण [द्विघात समीकरण], साइन की तालिका [साइन की तालिका], शक्ति श्रृंखला का योग [शक्ति श्रृंखला का योग], आदि शामिल हैं।आर्यभट्ट की रचनाओं का वर्णन मुख्यतः इसी रचना [आर्यभटीय] से मिलता है। संभवतः यह नाम स्वयं आर्यभट्ट ने नहीं, बल्कि बाद के आलोचकों ने दिया था। भास्कर प्रथम, जो आर्यभट के शिष्य थे, ने इस रचना को अश्मक-तंत्र [अश्माका से ग्रंथ] कहा। सामान्य तौर पर इसे आर्य-शत-अष्ट [आर्यभट के 108] भी कहा जाता है क्योंकि इसमें 108 श्लोक/श्लोक हैं।यह एक बहुत ही सारगर्भित – निहित सूत्र – साहित्य है, जिसकी प्रत्येक पंक्ति प्राचीन जटिल प्रथाओं का वर्णन करती है। 108 श्लोकों और 13 परिचयात्मक श्लोकों से बनी यह रचना 4 श्लोकों या अध्यायों में विभक्त है। वे अध्याय इस प्रकार हैं:

  • गीतिकापद [13 श्लोक],
  • मठपाद [33 श्लोक],
  • कलाक्रियापद [25 छंद],
  • गोलापाद [50 छंद]

सौर्य मंडल की गतिशीलता

आर्यभट ने यह तथ्य स्थापित किया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर निरंतर रूप से घुमती रहती हैं और यहीं कारण हैं कि आकाश में तारों की स्थिति बदलती रहती है। यह तथ्य इसके बिल्कुल विपरीत हैं कि आकाश घूमता हैं। इसका वर्णन उन्होंने आर्यभटीय में भी किया हैं।

ग्रहण

दू मान्यता के अनुसार राहु नमक ग्रह द्वारा सूर्य और चंद्रमा को निकल जाने के कारण क्रमशः सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होता है। आर्यभट्ट द्वारा इस धारणा को गलत सिद्ध किया गया और उन्होंने सूर्य ग्रहण एवं चंद्र ग्रहण का वैज्ञानिक ढंग से वर्णन किया है। उन्होंने यह बताया कि चांद एवं अन्य सूर्य ग्रह प्रकाश के परिवर्तित होने के कारण प्रकाशमान होते हैं, वास्तव में उनका कोई प्रकाश नहीं होता। आर्यभट्ट ने स्पष्ट किया है कि अग्रहण नामक घटना पृथ्वी पर पड़ने वाली छाया है अथवा पृथ्वी की छाया है।

सूर्य ग्रहण

पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य के परिक्रमा करती है और चंद्रमा अपने अक्ष पर घूमते हुए पृथ्वी की परिक्रमा के साथ ही सूर्य की परिक्रमा करता है। और इस दौरान जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आ जाता है तो चंद्रमा के बीच में आने से सूर्य का उतना ही सच छुप जाता है। और वह हमें काला या प्रकाशन दिखाई देता है और यह घटना सूर्यग्रहण कहलाती है।

चंद्र ग्रहण

चूँकि चंद्रमा अपने अक्ष पर घूमते हुए पृथ्वी की परिक्रमा के साथ ही सूर्य की परिक्रमा करता है और इस दौरान सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है। तू पृथ्वी की परछाई चंद्रमा पर पड़ती है और वह सूर्य प्रकाश प्राप्त नहीं कर पाता और यह घटना चंद्रग्रहण कहलाती है।

कक्षाओं का वास्तविक समय

आर्यभट्ट ने पृथ्वी की एक परिक्रमा का बिल्कुल उचित समय ज्ञात किया। यह अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा प्रतिदिन 24 घंटों में नहीं, बल्कि 23 घंटे, 56 मिनट और 1 सेकेंड में पूरी कर लेती है। इस प्रकार हमारे 1 साल में 365 दिन,6 घंटे, 12 मिनट 38 सेकंड होते हैं।

आर्यभट्ट का गणित और विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान

महान वैज्ञानिक और गणतिज्ञ आर्यभट्ट जी ने अपने महान खोजों और सिद्धान्तों से विज्ञान और गणित के क्षेत्र में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। उन्होंने शून्य, पाई, पृथ्वी की परिधि आदि की लंबाई बताकर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी कुछ महत्वपूर्ण खोज इस प्रकार हैं-

  • पाई का मान – आर्यभट्ट जी ने दशमलव के चार अंकों तक पाई का मान बताया है। उन्होंने पाई का मान 62832/20000 = 3.1416 के बराबर बताया। त्रिकोणमिति में आर्यभट्ट जी का योगदान- आर्यभट्ट जी का त्रिकोणमिति के क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने अपने इस ग्रंथ में आर्य सिद्धांत में ज्या, कोज्या, उत्क्रम ज्या, व्युज्या की परिभाषा बताई।
  • शून्य की खोज – आर्यभट्ट ने शून्य की खोज कर गणित में अपना अतिमहत्वपूर्ण योगदान दिया है। बीजगणित में घनों और वर्गों के जोड़ के सूत्र का अविष्कार किया।
  • खगोल विज्ञान के क्षेत्र में आर्यभट्ट जी ने अपना अहम योगदान दिया है, उन्होंने यह सिद्द किया है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर निरंतर रुप से घूमती है, जिसकी वजह से आसमान में तारों की स्थिति में बदलाव होता है । इसके साथ ही आर्यभट्ट जी ने यह भी बताया है कि पृथ्वी को अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करने में करीब 23 घंटे, 56 मिनट और 1 सेकंड का समय लगता है।
  • आर्यभट्ट जी ने सूर्य से ग्रहों की दूरी बताई, जो कि वर्तमान माप से मिलती-जुलती है। वहीं आज पृथ्वी से सूर्य की दूरी करीब 15 करोड़ किलोमीटर मानी जाती है, इसे एक 1 (AU) भी कहा जाता है।
  • पृथ्वी की परिधि की लंबाई की गणना – आर्यभट्ट जी ने पृथ्वी की लंबाई 39,968.05 किलोमीटर बताई थी, जो कि इसकी वास्तविक लंबाई (40,075.01 किलोमीटर) से महज 2 प्रतिशत ही कम है। वहीं आज के विज्ञान में इसे अभी भी आश्चर्यजनिक रुप से देखा जाता है।
  • इसके अलावा आर्यभट्ट जी ने वायुमंडल की ऊंचाई 80 किलोमीटर बताई। हालांकि, इसकी वास्तविक ऊंचाई 1600 किलोमीटर से भी ज्यादा है, लेकिन इसका करीब 99 फीसदी हिस्सा 80 किलोमीटर की सीमा तक ही सीमित है।
  • आर्यभट्ट जी ने एक साल की लंबाई 365.25868 दिन के बराबर बताई थी, जोकि वर्तमान गणना 365.25868 के काफी निकटतम है।
  • महान गणितज्ञ आर्यभट्ट जी की खगोलीय गणना ने ”जलाली कैलेंडर” बनाने में मद्द की थी।

आर्यभट्ट उपग्रह एवं आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान

19 अप्रैल, 1975 को भारत सरकार ने अपने पहला उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा था, जिसका नाम उन्होंने महान गणितज्ञ और खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी के नाम पर रखा था। यही नहीं इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) द्धारा वायुमंडलआर्यभट्ट उपग्रह एवं आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान के संताप मंडल में जीवाणुओं की खोज की गई थी।जिनमें से एक प्रजाति का नाम बैसिलस आर्यभट्ट रखा गया था, जबकि भारत के उत्तराखंड राज्य के नैनीताल में आर्यभट्ट के सम्मान में एक वैज्ञानिक संस्थान का नाम ”आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान” रखा गया है।

आर्यभट्ट का निधन

आर्यभट्ट का निधन दिसम्बर 550 ईसवी में हुआ था। उस वक्त, उनकी आयु 74 वर्ष के लगभग थी। लेकिन उनके जीवन के अंतिम अवधि और ठिकाने की सटीक जानकारी, आज भी संदिग्ध है।

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