मशहूर अर्थशास्त्र की रचना करने वाले “चाणक्य” का जीवन परिचय

Chadakya

चाणक्य कौन थे ?

चाणक्य एक शिक्षक, दार्शनिक, अर्थशास्त्री और राजनेता थे जिन्होंने भारतीय राजनीतिक ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ (राजनीति और अर्थशास्त्र का विज्ञान) लिखा था। उन्होंने मौर्य वंश की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे चाणक्य की शिक्षा तक्षशिला (अब पाकिस्तान में) में हुई थी, जो भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में स्थित शिक्षा का एक प्राचीन केंद्र था।

वह अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्ध रणनीतियों, चिकित्सा और ज्योतिष जैसे विभिन्न विषयों में गहन ज्ञान रखने वाले एक उच्च विद्वान व्यक्ति थे। उन्होंने एक शिक्षक के रूप में अपना करियर शुरू किया, वे सम्राट चंद्रगुप्त के एक भरोसेमंद सहयोगी बन गए। सम्राट के सलाहकार के रूप में काम करते हुए, उन्होंने चंद्रगुप्त को मगध क्षेत्र में पाटलिपुत्र में शक्तिशाली नंद वंश को उखाड़ फेंकने में मदद की और चंद्रगुप्त को नई शक्तियां प्राप्त करने में मदद की। वह चंद्रगुप्त के पुत्र बिंदुसार के लिए भी सलाहकार थे।

जीवन से जुड़ी विशेष जानकारी, समर्पण सहित आगामी विचार व्यवस्था –

वास्तविक नाम विष्णुगुप्त, कौटिल्य
निक नेम चाणक्य और भारतीय मेकियावली
प्रसिद्द शास्त्रीय राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र के जनक
जन्म तारीख 375 ई.
जन्म स्थान तक्षशिला (अब जिला रावलपिंडी, पाकिस्तान) गोला क्षेत्र में गांव चणक (वर्तमान में उड़ीसा) (जैन पाठ्यक्रम के अनुसार)
गृहनगर तक्षशिला
मृत्यु तिथि . 283ई
मृत्यु का स्थान पाटलिपुत्र (वर्तमान में पटना), भारत
उम्र 75 वर्ष (मृत्यु के समय )
पिता का नाम ऋषि कनक
माँ का नाम चनेश्वरी
पत्नी का नाम यशोमती
पेशा शिक्षक, दार्शनिक, अर्थशास्त्री, कूटनीतिज्ञ और चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री
नागरिकता मौर्य राजवंश

चाणक्य का प्रारंभिक जीवन

चाणक्य का जन्म 375 ईसा पूर्व में तक्षशिला में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता कनक हैं और उनकी माता चनेश्वरी हैं। बचपन में इन्होने वेदों का अध्ययन किया और राजनीति के बारे में सीखा।

उसके पास एक ज्ञान दांत था। ऐसी मान्यता थी कि ज्ञान दांत का होना राजा बनने की निशानी है। उनकी माँ एक बार एक ज्योतिषी की बातें सुनकर डर गईं कि “वह बड़ा होकर राजा बनेगा और राजा बनने के बाद मुझे भूल जाएगा”। तब इन्होने अपने ज्ञान दांत तोड़ दिए और अपनी मां से वादा किया कि “माँ, आप चिंता न करें। मैं तुम्हारी अच्छी देखभाल करूंगा।”

चाणक्य की शिक्षा

चाणक्य की शिक्षा तक्षशिला में हुई थी। वह दिखने में अच्छा नहीं था। हर कोई उसके टूटे दांत, काले रंग और टेढ़ी टांगों का मजाक उड़ा रहा था। इसलिए उनकी आंखों में हमेशा क्रोध की ज्वाला बनी रहती थी। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, इन्होने तक्षशिला, नालंदा सहित आसपास के क्षेत्रों में एक शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया।

चाणक्य का पारिवारिक जीवन

इनका दृढ़ विश्वास था कि “एक महिला जो शरीर से सुंदर है, वह आपको केवल एक रात के लिए खुश रख सकती है। लेकिन मन से खूबसूरत औरत आपको जिंदगी भर खुश रखती है।”

इसलिए उन्होंने अपने ब्राह्मण वंश में यशोधरा नाम की एक लड़की से शादी की। वह भी उनकी तरह खूबसूरत नहीं थी। उनका काला रंग कुछ लोगों के लिए मजाक का कारण बन गया था। एक बार जब उनकी पत्नी अपने भाई के घर एक समारोह में गई, तो सभी ने इनकी गरीबी का मजाक उड़ाया। इससे नाखुश होकर उनकी पत्नी ने उन्हें राजा धनानंद से मिलने और उपहार के रूप में कुछ पैसे लेने की सलाह दी।

चाणक्य की जीवन की 2 ऐसी घटनाएं जिन्होंने उनका जीवन बदल दिया

चाणक्य एक कुशल और महान चरित्र वाले व्यक्ति थे इसके साथ ही वे एक महान शिक्षक भी थे। अपने महान विचारों और महान नीतियों से वे काफी लोकप्रिय हो गए थे उनकी ख्याति सातवें आसमान पर थी लेकिन इस दौरान ऐसी दो घटनाएं घटी की आचार्य चाणक्य का पूरा जीवन ही बदल गया।

  • पहली घटना – भारत पर सिकंदर का आक्रमण और तात्कालिक छोटे राज्यों की ह्रार।
  • दूसरी घटना – मगध के शासक द्वारा कौटिल्य का किया गया अपमान।

ये दो घटनाएं उनके जीवन की ऐसी घटनाएं हैं जिनकी वजह से कौटिल्य ने देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने का संकल्प लिया और उन्होनें शिक्षक बनकर बच्चों के पढ़ाने के बजाय देश के शासकों को शिक्षित करने और उचित नीतियों को सिखाने का फैसला लिया और वे अपने दृढ़ संकल्प के साथ घर से निकल पड़े।

सिकन्दर का भारत पर आक्रमण

आपको बता दें कि जब भारत पर सिकन्दर ने आक्रमण किया था उस समय चाणक्य तक्षशिला में प्रिंसिपल थे। ये उस समय की बात है जब तक्षशिला और गान्धार के सम्राट आम्भि ने सिकन्दर से समझौता कर लिया था। चाणक्य ने भारत की संस्कृति को बचाने के लिए सभी राजाओं से आग्रह किया लेकिन उस समय सिकन्दर से लड़ने कोई नहीं आया। जिसके बाद पुरु ने सिकन्दर से युद्ध किया लेकिन वे हार गए।

उस समय मगध अच्छा खासा शक्तिशाली राज्य था और उसके पड़ोसी राज्यों की इस राज्य पर ही नजर थी। जिसको देखते हुए देशहित की रक्षा के लिए विष्णुगुप्त, मग्ध के तत्कालीन सम्राट धनानन्द से सिकंदर के प्रभाव को रोकने के लिए सहायता मांगने गए। लेकिन भोग-विलास एवं शक्ति के घमंड में चूर धनानंद ने चाणक्य के इस प्रस्ताव ठुकरा दिया। और उनसे कहा कि –

”पंडित हो और अपनी चोटी का ही ध्यान रखो; युद्ध करना राजा का काम है तुम पंडित हो सिर्फ पंडिताई करो।”

तभी चाणक्य ने नंद साम्राज्य का विनाश करने की प्रतिज्ञा ली।

चाणक्य की रचनाएं

विद्वान चाणक्य ने भारतीय राजनैतक ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की, जिसमें भारत की उस समय तक की आर्थिक, राजनीतिक और समाजिक नीतियों की जानकारी दी गयी थी। राज्य के शासकों को इस बात की जानकारी हो सके कि युद्ध, अकाल और महामारी के समय राज्य का प्रबंधन कैसे किया जाए, यह इस ग्रन्थ की रचना के पीछे का हेतु था।

चाणक्य और चन्द्रगुप्त

चाणक्य और चंद्रगुप्त का गहरा संबंध है। चाणक्य चंद्रगुप्त के सम्राज्य के महामंत्री थे और उन्होनें ही चंद्रगुप्त का सम्राज्य स्थापित करने में उनकी मद्द की थी।

दरअसल, नंद सम्राज्य के शासक द्धारा अपमान के बाद चाणक्य अपनी प्रतिज्ञा को सार्थक करने के निकल पड़े। इसके लिए उन्होनें चंद्रगुप्त को अपना शिष्य बनाया। चाणक्य उस समय चंद्रगुप्त की प्रतिभा को समझ गए थे इसलिए उन्होनें चंद्रगुप्त को नंद सम्राज्य के शासक से बदला लेने के लिए चुना। जब चाणक्य की चंद्रगुप्त मौर्य से मुलाकात हुई तब चंद्रगुप्त महज 9 साल के थे। इसके बाद चाणक्य ने अपने विलक्षण ज्ञान से चंद्रगुप्त को अप्राविधिक विषयों और व्यावहारिक तथा प्राविधिक कलाओं की शिक्षा दी।

चाणक्य ने चंद्रगुप्त को चुनने का फैसला इसलिए भी लिया क्योंकि उस समय कुछ मुख्य शासक जातियां ही थी जिसमे शाक्य, मौर्य का प्रभाव ज्यादा था। वहीं चन्द्रगुप्त उसी गण के प्रमुख का पुत्र था। जिसके बाद चाणक्य ने उसे अपना शिष्य बना लिया, और उनके साथ एक नए सम्राज्य की स्थापना की।

चाणक्य की नीतियों से नंद सम्राज्य का पतन और मौर्य सम्राज्य की स्थापना

शक्तिशाली और घमंड में चूर नंद वंश का राजा धनानंद जो कि अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल करता था और जिसने यशस्वी और महान दार्शनिक चाणक्य का अपमान किया था जिसके बाद चाणक्य ने चंद्रगुप्त के साथ मिलकर अपनी नीतियों से नंद वंश के पतन किया था। आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद सम्राज्य के पतन के मकसद को लेकर कुछ अन्य शक्तिशाली शासकों के साथ गठबंधन बनाए थे।

आचार्य चाणक्य विलक्षण प्रतिभा से भरे एक बेहद बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति थे। उन्होंनें अपनी चालाकी से कुछ मनोरंजक युद्ध रणनीतियों को तैयार किया और वे बाद में उन्होनें मगध क्षेत्र के पाटलिपुत्र में नंदा वंश का पतन किया और जीत हासिल की थी। वहीं नंदा सम्राज्य के आखिरी शासक की हार के बाद नंदा सम्राज्य का पतन हो गया इसके बाद उन्होनें चंदगुप्त मौर्य के साथ मिलकर एक नए सम्राज्य ‘मौर्य सम्राज्य‘ की स्थापना की। चंद्र गुप्त मौर्य के दरबार में उन्होनें राजनीतिक सलाहकार बनकर अपनी सेवाएं दी।

चाणक्य की मौर्य सम्राज्य के विस्तार में अहम भूमिका

  • चाणक्य के मार्गदर्शन से मौर्य सम्राज्य के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य गंधरा में स्थित जो कि वर्तमान समय अफगानिस्तान में, अलेक्जेंडर द ग्रेट के जनरलों को हराने के लिए आगे बढ़े। बुद्धिमान और निर्मम, चाणक्य ने अपनी महान नीतियों से चंद्रगुप्त के मौर्य साम्राज्य को उस समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से बदलने में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • चाणक्य की नीतियों से मौर्य सम्राज्य का विस्तार पश्चिम में सिंधु नदी से, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक किया गया बाद में मौर्य साम्राज्य ने पंजाब पर भी अपना नियंत्रण कर लिया था इस तरह मौर्य सम्राज्य का विस्तार पूरे भारत में किया गया।
  • अनेक विषयों के जानकार और महान विद्धान चाणक्य ने भारतीय राजनैतक ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ लिखा जिसमें भारत की उस समय तक की आर्थिक, राजनीतिक और समाजिक नीतियों की व्याख्या समेत अन्य महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी दी गई है।
  • ये ग्रंथ चाणक्य ने इसलिए लिखा था ताकि राज्य के शासकों को इस बात की जानकारी हो सके कि युद्ध, अकाल और महामारी के समय राज्य का प्रबंधन कैसे किया जाए।
  • जैन ग्रंथों में वर्णित एक लोकप्रिय किंवदंती के अनुसार, चाणक्य सम्राट चंद्रगुप्त के भोजन में जहर की छोटी खुराक को मिलाते थे जिससे मौर्य वंश के सम्राट की दुश्मनों द्वारा संभावित जहरीले प्रयासों के खिलाफ मजबूती बन सके और वे अपने प्राणों की रक्षा कर सकें।
  • वहीं इस बात की जानकारी सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को नहीं थी इसलिए उन्होनें अपना खाना अपनी गर्भवती रानी दुध्रा को खिला दीया। आपको बता दें कि उस समय रानी के गर्भ के आखिरी दिन चल रहे थे। वे कुछ दिन बाद ही बच्चे को जन्म देने के योग्य थी।
  • लेकिन रानी द्धारा खाए गए भोजन में जहर ने जैसे ही काम करना शुरु किया वैसे ही रानी बेहोश हो गई और थोडे़ समय बाद ही उनकी मौत हो गई। जब इस बात की जानकारी चाणक्य को हुई तो उन्होनें रानी के गर्भ में पल रहे नवजात बच्चे को बचाने के लिए अपनी बुद्धिमान नीति का इस्तेमाल कर अपना पेट खोल दिया और बच्चे को निकाला।
  • इस बच्चे का नाम बिंदुसारा रखा गया जिसे बड़ा होने पर मौर्य सम्राज्य का उत्तराधिकारी भी बनाया गया। वहीं चाणक्य ने कुछ सालों बाद बिंदुसारा के राजनैतिक सलाहकार के रूप में भी काम किया।

चाणक्य का अर्थशास्त्र

चाणक्य ने समाज को कर्म के आधार पर चार वर्गो में बंटा है

  • ब्राह्मण
  • श्रत्रिय
  • वैश्य
  • शुद्र

शासक कैसा होना चाहिये, इसका विवरण चाणक्य निती में विस्तृत रूप से किया गया है, उनके अनुसार –

  • राजा कुलीन होना चाहिए, तभी वह एक अच्छे राज्य का निर्माण करने में सक्षम हो सकेगा।
  • चाणक्य के मुताबिक एक राज्य के शासक को काम, क्रोध लोभ, मोह और माया से दूर रहना चाहिए।
  • राजा शारीरिक रूप से स्वस्थ और शासन का अनुसरण करने वाला होना चाहिए।
  • एक राजा को हमेशा अपने प्रजा के हितों का ध्यान रखना चाहिए।

चाणक्य की राज्य के लिए अवधारणा

महान विद्धान और दार्शनिक चाणक्य ने कुशल राज्य की स्थापना के लिए अपने बहुत अच्छे विचार व्यक्त किए है। चाणक्य की अवधारणा के अनुसार एक कुशल साम्राज्य के लिए प्रजा और राजा के बीच एक पुत्र और पिता जैसे सम्बन्ध बनने चाहिए। चाणक्य के साम्राज्य की नीति में कहा है कि साम्राज्य का निर्माण जब ” मत्स्य न्याय ” के कानून से तंग आकर लोगो ने मनु को अपना राजा चुना और अपनी खेती का 6वां भाग और अपने आभूषण का 10वां भाग महाराजा को देने को कहा। इसके बदले में राजा को समाज कल्याण और प्रजा की रक्षा करने को कहा गया था।

चाणक्य की विदेश नीति

  • संधि – देश एव राज्य में शांति के लिये अन्य देश के शासक या राजा के साथ कुछ करार किये जाते है। जो ताकतवर हो उसका फायदा यह की शत्रु को कमजोर करना है।
  • विग्रह – शत्रु के विरुद्ध उचित रणनीति बना के युद्ध करना जिससे अपने राज्य में शांति बनी रहे।
  • यान – कोई भी राज्य से युद्ध घोषणा किये बिना युद्ध की तैयारी करना मुख्य माना जाता है।
  • आसन – तटस्थता की नीति हमेशा बनाये रखना और उनका पालन करना।
  • आत्मरक्षा – दुसरे साम्राज्य के राजा से मदद मांगना।
  • दौदिभाव – मित्र राजा से शांति का करार करके अन्य राजाओ के साथ युद्ध करने की नीति अपनाना।

चाणक्य का सम्मान और पुरस्कार

बुद्धिमता और विलक्षण प्रतिभा के धनी चाणक्य के सम्मान में नई दिेल्ली में राजनयिक एन्क्लेव का नाम चाणक्यपुरी रखा है। इसके सिवा भी कई अन्य स्थान और संस्थानों को चाणक्य के नाम दिए है। उसके जीवन चरित्र पर आधारित कई टेलीविजन सीरीज और किताबों के भी विषय है। जिनसे आप चाणक्य के अर्थशास्त्र को समज सकते है। कौटिल्य के लिए कई पुस्तकों और धारावाहिको का निर्माण आज भी हुआ करता है।

चाणक्य के विचार

  • “जब कोई सजा थोड़े मुआवजे के साथ दी जाती है, तब वह लोगो को नेकी करने के लिए निष्टावान एवम पैसे और ख़ुशी कमाने के लिए प्रेरित करती है”।
  • “भाग्य उनका साथ देता है, जो हर संकट का सामना करके भी अपना लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहते हैं”।
  • “सिंह से सीखो – जो भी करना जोरदार तरीके से करना और दिल लगाकर करना”।
  • “जो लोगो पर कठोर से कठोर सजा को लागू करता है। वो लोगो की नजर में घिनौना बनता जाता है, जबकि नरम सजा लागू करता है. वह तुच्छ बनता है। लेकिन जो योग्य सजा को लागू करता है वह सम्माननीय कहलाता है।
  • “वह जो भलाई को लोगो के दिलो में सभी के लिए विकसित करता चला जाता है. वह आसानी से अपने लक्ष्य प्राप्ति के एक-एक कदम आगे बढ़ता चला जाता है।
  • “दुसरो की गलतियों से सीखो, अपने ही अनुभव से सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ जाएँगी”।

चाणक्य की मृत्यु

कुछ दिनों बाद बिन्दुसार को पश्चाताप हुआ कि उन्हें आचार्य पर क्रोध नहीं करना चाहिए था। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। चाणक्य जंगल में एक छोटी सी झोपड़ी में साधु की तरह रह रहे थे। बिंदुसार ने तब सुबंधु को जंगल जाने और उनको समझाकर वापस लेने का आदेश दिया। लेकिन सुबंधु नहीं चाहते थे की चाणक्य वापस महल में कदम रखे।

इसलिए उसने जंगल में चाणक्य की कुटिया देखी और उसमें आग लगा दी और उनको जिंदा जला दिया। इस तरह सुबंधु की साजिश से 283ई. में चाणक्य की मौत हो गई।सुबंधु ने जानबूझकर चाणक्य को मार डाला और अदालत में लौट आए और बिंदुसार को झूठी रिपोर्ट दी कि “उन्होंने अपमान के कारण आत्महत्या की”।

धनानंद से अपनी नफरत के कारण चाणक्य ने एक सड़क के भिखारी चंद्रगुप्त को सम्राट बनाया था और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। लेकिन अब उसे उसी राज्य के लोगों ने मार डाला। चाणक्य के मामले में भी “जो बदला लेने जाता है, वह एक दिन बुरी तरह से कब्रिस्तान में शामिल हो जाता है” कहावत सच हो गई।

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