भारत के प्रसिद्ध शहनाई वादक “उस्ताद बिस्मिल्लाह खान” का जीवन परिचय

Bismillah Khan

भारतीय संस्कृति में शास्त्रीय संगीत का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत को ही क्लासिकल म्यूजिक के नाम से भी जाना जाता है। जिसे वाद यंत्र के माध्यम से शब्द रहित, ध्वनि के उतार चढ़ाव से उत्पन्न किया जाता है। संगीत एक विशेष साधना है, यह कलाकार की लगन, रियाज, जोश पर निर्भर करता है कि वह अपनी प्रतिभा से देश का नाम कैसे रोशन करे। एक कलाकार वास्तव में ईश्वर की सच्ची नियामत होती है।

बिस्मिल्लाह खान कौन है?

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां एक प्रख्यात भारतीय शहनाई वादक हैं जिन्होंने शहनाई को भारत में ही नहीं, बल्कि भारत के बाहर भी एक विशिष्ट पहचान दिलाने में अपना जीवन समर्पित किया। ये वो शख्स है जिन्होंने संगीत के इस पावन उपकरण शहनाई को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

जीवन से जुड़ी विशेष जानकारी, समर्पण सहित आगामी विचार व्यवस्था

नाम उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां
जन्म 21 मार्च, 1916
जन्म स्थान डुमरांव गांव, बिहार
पिता का नाम पैगम्बर खान
माता का नाम मितन खान
पेशा शहनाई वादक
बच्चे नाजिम हुसैन और नैय्यर हुसैन
मृत्यु 21 अगस्त 2006
अवार्ड भारत रत्न

बिस्मिल्लाह खान का प्रारंभिक जीवन

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संगीतकारों में से एक बिस्मिल्लाह खां जी 21 मार्च , 1916 के दिन बिहार के डुमरांव गांव में जन्में थे। बचपन में उनका नाम कमरुद्धीन था, लेकिन बाद में उनके दादा रसूल बख्श उनका नाम ‘बिस्मिल्लाह’ रख दिया था, जिसका मतलब था ‘अच्छी शुरुआत’। बिस्मिल्लाह जी का परिवार संगीत के क्षेत्र से जुड़ा हुआ था।उनका परिवार उनके पिछली 5 पीढ़ियों से शहनाई वादन का प्रतिवादक रहा है। वहीं उनके पूर्वज बिहार के भोजुपर रजवाड़े में दरबारी संगीतकार भी थे।

बिस्मिल्लाह खान की शुरुआती शिक्षा

बिस्मिल्लाह खान की शिक्षा के बारे में बात करें तो वह महज 6 साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खां अपने पिता पैंगमर खां के साथ बनारस आ गए। वहां उन्होंने अपने चाचा अली बख्श ‘विलायतु’ से शहनाई बजाना सीखा। आपको बता दें कि उनके उस्ताद चाचा काशी विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई-वादन का काम करते थे। वहीं उनके पिता भी डुमराव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिह के दरबार में शहनाई वादक थे।

बिस्मिल्लाह खान का पारिवारिक जीवन

उस्ताद खां की शादी 16 साल की छोटी उम्र में हो गई थी। लेकिन, उन्हें अपने वाद्य यंत्र से बहुत प्यार था, जिसे वे अपनी दूसरी बेगम कहा करते थे। जब उन्हें सुपुर्द ए खाक किया गया तो साथ में उनकी शहनाई को भी दफना दिया गया था। उनकी आखिरी इच्छा कभी पूरी नहीं हो पाई। वह इंडिया गेट पर देश के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देना चाहते थे, लेकिन 21 अगस्त 2006 में उनकी मृत्यु हो गई।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का सफर

  • बिस्मिल्लाह खान एक ऐसे व्यक्ति जो कोमल हृदय मानव संगीत के द्वारा आत्मा की गहराइयों में उतर जाते थे। ऐसा व्यक्तित्व वर्ल्ड फेमस शहनाई वादक के रूप में जाने जाते हैं। शहनाई की दुनिया में उस्ताद बिस्मिल्ला खान को शहनाई का जादूगर भी माना जाता है।
  • उन्होंने अपना जीवन संगीत को समर्पित कर दिया और शहनाई वादन को विश्व स्तर पर नई ऊंचाइयां देने का निश्चय कर लिया।
  • उस्ताद बिस्मिल्लाह खान संगीत और पूजा को एक ही दृष्टि से देखते थे। उनका मानना था कि संगीत सुर और पूजा एक ही चीज है।
  • बिस्मिल्लाह खान ने अपनी शहनाई की गूंज से अफगानिस्तान, यूरोप, ईरान, इराक, कनाडा, अफ्रीका, रूस, अमेरिका, जापान, हांगकांग सहित विश्व के सभी प्रमुख देशों की श्रोताओं को भावविभोर किया।
  • उनका संगीत समुंद्र की तरह विराट था। लेकिन वह विनम्रतापूर्वक कहते थे। मैं अभी मुश्किल से इसके किनारे तक ही पहुंच पाया हूं मेरी खोज अभी जारी है।
  • सन् 2000 में बिस्मिल्लाह खाँ ने क्वीन एलिजाबेथ हॉल में लाइव शो देखकर हजारों दर्शकों को अपनी शहनाई से मंत्रमुग्ध किया था ।
  • 26 जनवरी 1950 को भारत के पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर भी उन्होंने लाल किले से राग कैफी की प्रस्तुति दी थी |

बिस्मिल्लाह खां का भारत के लिए प्रमुख योगदान

15 अगस्त, 1947 में देश की आजादी के पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहराकर आजादी का जश्न मनाया जा रहा है, तब बिस्मिल्लाह ख़ां जी ने अपनी मर्मस्पर्शी शहनाई बजाकर भारत की आजादी का स्वागत किया था।

वहीं तब से लेकर हर साल 15 अगस्त को दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का शहनाई वादन परंपरा बन गई है।

बिस्मिल्ला ख़ाँ के मशहूर एल्बम और लाइव शो

  • दुनिया के महान शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां जी ने कई फिल्मों में भी अपना संगीत देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
  • बिस्मिल्लाह खां ने जी कन्नड़ फिल्म सनादी अपत्रा में राजकुमार के किरदार के लिये शहनाई बजाई थी।
  • साल 1959 में फिल्म गूंज उठी शेनाई के लिए भी बिस्मिल्लाह खां ने अपनी शहनाई की धुन दी थी।
  • साल 1994 में मेस्ट्रो च्वॉइस में भी बिस्मिल्लाह खां ने अपनी शहनाई की धुन दी थी।
  • साल 1994 में मेघ मल्हार, वोल में भी बिस्मिल्लाह खां ने अपनी शहनाई की धुन दी थी।
  • साल 2000 में बिस्मिल्लाह खां जी ने क्वीन एलिज़ाबेथ हॉल में लाइव शो देकर हजारों दर्शकों को अपनी मधुर शहनाई से मंत्रमुग्ध किया था।
  • साल 2000 में बिस्मिल्लाह खां ने लन्दन में लाइव परफॉरमेंस, वोल में भी अपनी शहनाई की धुन दी थी।
शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान

बिस्मिल्लाह खान का फ़िल्मी सफर

उनका थोडा संबध फिल्मो में भी रहा है। उन्होंने डा.राजकुमार की फिल्म “सानादी अपन्ना” में अपन्ना के चरित्र में शहनाई वादन किया, इसके अलावा सत्यजीत रे की फिल्म “जलसागर” में भी उन्होंने अभिनय किया है। “गूंज उठी शहनाई” फिल्म में शहनाई का संगीत बिस्मिल्ला खा ने हे दिया था। प्रसिद्ध निर्देशक गौतम घोष ने बिस्मिल्लाह खा के जीवन पर आधारित एक वृत चित्र “संग ए मील से मुलाक़ात” का निर्माण किया है।

बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान की फिल्म ‘स्वदेश’ का गाना ‘ये जो देश है मेरा’ का इंस्ट्रमेंटल ट्रेक बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की धुन पर तैयार हुआ था। उन्होंने कन्नड़ सुपरस्टार राजकुमार की फिल्म ‘सनादि अपन्ना’, सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसाघर’ और विजय भट्ट की फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ में भी शहनाई बजाई थी।

शहनाई वादक बिस्मि्ल्लाह खां को मिले सम्मान और पुरस्कार

  • संगीत के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए साल 2001 में शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां को देश के सर्वोच्च सम्मान ”भारत रत्न” से सम्मानित किया गया।
  • संगीत की दुनिया में शहनाई को अलग पहचान दिलवाने वाले बिस्मिल्लाह खां जी को 1980 में पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा गया था।
  • दुनिया के महान शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां को 1968 में भारत के सर्वोच्च सम्मान में से एक पदम भूषण सम्मान से नवाजा गया था।
  • महान शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां को साल 1961 में भारत के प्रतिष्ठित पुरस्कार पद्म श्री से नवाजा गया था।
  • संगीत के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महान संगीत वादक बिस्मिल्लाह खां को 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
  • महान शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां को साल 1930 में ऑल इंडिया म्यूजिक कांफ्रेंस में बेस्ट परफॉर्मर पुरस्कार से नवाजा गया था।
  • इसके अलावा बिस्मिल्लाह खां जी को मध्य प्रदेश सरकार द्धारा तानसेन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

बिस्मिल्लाह खान :- एकता का प्रतीक

खान को याद करते हुए संगीत शिक्षक और गायक पंडित मोहनदेव कहते हैं, ‘खान धर्म की सीमाओं से परे सरस्वती के भक्त थे। वह अक्सर हिन्दू मंदिरों में शहनाई वादन किया करते थे। शहनाई उनके लिए अल्लाह की इबादत और सरस्वती वंदना की भी माध्यम थी। उन्होंने अपने संगीत के माध्यम से उन्होंने शांति और प्रेम का संदेश दिया।

खान के ऊपर लिखी एक किताब ‘सुर की बारादरी’ में लेखक यतीन्द्र मिश्र ने लिखा है, ‘खां कहते थे कि संगीत वह चीज है, जिसमें जात-पात कुछ नहीं है। संगीत किसी मजहब का बुरा नहीं चाहता।’ किताब में मिश्र ने बनारस से खान के जुड़ाव के बारे में भी लिखा है। उन्होंने लिखा है, ‘खान कहते थे कि उनकी शहनाई बनारस का हिस्सा है। वह जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज करते हुए जवान हुए हैं तो कहीं ना कहीं बनारस का रस उनकी शहनाई में टपकेगा ही।’

बिस्मिल्लाह खान के साथ घटित एक घटना का सच

एक बार बिस्मिल्लाह खां की चार शहनाइयां चोरी हो गईं, उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने मामले की जांच शुरू की। जांच में पता चला कि उन्हीं के एक नाती ने 17000 रुपये के लिए ये शहनाई चोरी कर बेच दीं। इनमें तीन शहनाइयां चांदी की थीं और एक लकड़ी की थी, लेकिन उसका बेस भी चांदी का ही था। पुलिस ने उनके नाती शादाब और वाराणसी के चौक इलाके के 2 ज्वैलर्स को गिरफ्तार किया था। पूछताछ में बताया कि उन्होंने शहनाइयों को गलाकर 1.66 किलो चांदी उसमें से निकाल ली।

बिस्मिल्लाह खान का निधन

वे अपने लिए कभी भी नहीं सोचते थे, हालांकि इसी वजह से उन्हें आर्थिक मुसीबतों का भी सामना करना पड़ा था। जिसके बाद सरकार को उनकी मद्द के लिए आगे आना पड़ा था। उस्ताद ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी, और 21 अगस्‍त, साल 2006 में इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गए थे।

वहीं मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां के सम्मान में उनके इंतकाल के दौरान शहनाई भी दफ्न की गई थी। आपको बता दें कि दूरदर्शन और आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून में भी बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की आवाज है। वहीं आज भी उनकी शहनाई की गूंज लोगों के कानों में गूंजती हैं। बिस्मिल्लाह खान साहब के कुछ शब्द –

“सिर्फ़ संगीत ही है, जो इस देश की विरासत और तहज़ीब को एकाकार करने की ताक़त रखता है”।

बिस्मिल्लाह खान के रोचक किस्से

  • यह भारत रत्न पाने वाले तीसरे शास्त्रीय संगीतकार थे।
  • उनके नाम पर 1992 में ईरान के तेहरान शहर में एक बड़ा ऑडिटोरियम बनाया गया जिसका नाम “तालार मौसिकी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान “ उनके नाम पर रखा गया।
  • उन्होंने कम उम्र में ठुमरी ,छैती, कजरी और स्वानी जैसी कई विधाओं को सीख लिया था।
  • उन्होंने ख्याल म्यूजिक में पढ़ाई की है।
  • 1997 में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर लाल किले के दीवाने- आम से शहनाई बजाई थी।
  • उनकी अंतिम इच्छा दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने का था परंतु वह पूरी नहीं हो सकी।
  • बिस्मिल्लाह खाँ की मृत्यु :- मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खाँ का 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।
  • आज भी जब शहनाई का नाम आता है तो उनको याद किया जाता है।

Leave a Reply