राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जीवन परिचय

भविष्य में जब कभी भी भारतीय आंदोलनों की बात की जाएगी, तो उसमें महात्मा गांधी का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। लगभग सभी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी एक महत्त्वूर्ण चेहरा रहे हैं। महात्मा गांधी भारतीय इतिहास के एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने देशहित के लिए अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी। वह आजादी के आंदोलन के एक ऐसे नेता थे जिन्होंने अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अंग्रेजी शासकों के नाक में दम कर दिया था। महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के नाम से भी संबोधित किया जाता है। उनकी सत्य और अहिंसा की विचारधारा से मार्टिन लूथर किंग और नेलसन मंडेला भी काफी प्रभावित थे।

जीवन से जुड़ी विशेष जानकारी

गांधीजी का प्रारंभिक जीवन

मोहनदास करमचन्द गान्धी का जन्म भारत में गुजरात के एक तटीय शहर पोरबंदर में 2 अक्टूबर सन् 1869 को हुआ था। उनके पिता करमचन्द गान्धी ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान थे। मोहनदास की माता पुतलीबाई परनामी वैश्य समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। सन 1883 में साढे 13 साल की उम्र में ही उनका विवाह 14 साल की कस्तूरबा से करा दिया गया। जब मोहनदास 15 वर्ष के थे तब इनकी पहली सन्तान ने जन्म लिया लेकिन वह केवल कुछ दिन ही जीवित रही। उनके पिता करमचन्द गाँधी भी इसी साल (1885) में चल बसे। बाद में मोहनदास और कस्तूरबा के चार सन्तान हुईं – हरीलाल गान्धी (1888), मणिलाल गान्धी (1892), रामदास गान्धी (1897) और देवदास गांधी (1900)।

उनकी मिडिल स्कूल की शिक्षा पोरबंदर में और हाई स्कूल की शिक्षा राजकोट में हुई। शैक्षणिक स्तर पर मोहनदास एक औसत छात्र ही रहे। सन 1887 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अहमदाबाद से उत्तीर्ण की। इसके बाद मोहनदास ने भावनगर के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया पर ख़राब स्वास्थ्य और गृह वियोग के कारण वह अप्रसन्न ही रहे और कॉलेज छोड़कर पोरबंदर वापस चले गए।

गांधी जी की विदेश में शिक्षा और वकालत

मोहनदास अपने परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे इसलिए उनके परिवार वाले ऐसा मानते थे कि वह अपने पिता और चाचा का उत्तराधिकारी (दीवान) बन सकते थे। इसीलिए गांधीजी वर्ष 1888 में मोहनदास यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये इंग्लैंड चले गये। अपने माँ को दिए गए वचन के अनुसार ही उन्होंने लन्दन में अपना वक़्त गुजारा। वहां उन्हें शाकाहारी खाने से सम्बंधित बहुत कठिनाई हुई और शुरूआती दिनो में कई बार भूखे ही रहना पड़ता था।

इसके साथ ही जून 1891 में गाँधी भारत लौट गए और वहां जाकर उन्हें अपनी मां के मौत के बारे में पता चला।इसके बाद वो राजकोट चले गए जहाँ उन्होंने जरूरतमन्दों के लिये मुकदमे की अर्जियाँ लिखने का कार्य शुरू कर दिया परन्तु कुछ समय बाद उन्हें यह काम भी छोड़ना पड़ा। आख़िरकार सन् 1893 में एक भारतीय फर्म से नेटल (दक्षिण अफ्रीका) में एक वर्ष के करार पर वकालत का कार्य स्वीकार कर लिया।

महात्मा गांधी का अफ्रीका से भारत आगमन

महात्मा गांधी अपने काम से अफ्रीका में बहुत ख्याति बटोर चुके थे। आखिरकार सन 1915 में 46 वर्ष की उम्र में गांधी जी पुनः भारत वापस आये। इस दौरान गांधी जी का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया। अपने देश मे भी गांधी जी कुछ बड़ा करने की चाह लिए हुए थे। लेकिन पुरे भारत के आर्थिक और सामाजिक स्थिति का उन्हें बेहतर ज्ञान नही था। इसलिए उस वक़्त के एक बड़े कांग्रेसी नेता और गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर गांधी जी ने पूरे एक साल तक देश के हर एक हिस्से का भ्रमण किया और देश की स्थिति को बेहतर तरीके से समझा।

महात्मा गांधी के किए गए विभिन्न आंदोलन

महात्मा गांधी द्वारा प्रथम आंदोलन

महात्मा गांधी ने अपने देश मे पहला सफल आंदोलन चंपारण में किया। यह आंदोलन गांधी जी ने वहां के किसानों के हक में किया था। इस आंदोलन के द्वारा किसानों को 25% धन वापस दिलवाया। यह आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा किया गया प्रथम आंदोलन था। जो गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों के लिए था। यहां के किसानों को उत्पादन के बदले में बहुत कम हिस्सा दिया जाता था, जिस कारण यहां के किसानों की स्थिति बहुत बिगड़ गई। इसी दौरान यहां अकाल पड़ गया, जिससे स्थिति और भी बिगड़ गई. इस पर गांधी जी ने खुद काम करना शुरू किया, और अंग्रेजों के सामने यह प्रस्ताव रखा कि जो किसान सक्षम है, वो खुद ही अपना कर अदा कर देंगे। बदले में गरीब किसानों का कर माफ किया जाए। यह प्रस्ताव अंग्रेजो ने स्वीकार कर लिया।

महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन

जलियांवाला हत्याकांड से पूरे देश मे एक भयानक आक्रोश था।इसी के विरोध में देश मे कई हिंसक घटनाएं भी हुई।जलियांवाला हत्याकांड ने गांधी जी को भी पूरी तरह झकझोर दिया था। लेकिन इसके विरोध में वो हिंसा के बिल्कुल भी पक्षधर नही थे। उनका कहना था कि देश का हर पुरुष और स्त्री खादी काते और खादी के बने ही वस्त्र पहने। साथ ही जो भी लोग अंग्रेजो की दी हुई नौकरी कर रहे है। वो इस नौकरी को छोड़ दे। धीरे-धीरे पूरे देश से असहयोग आंदोलन को सहयोग मिलने लगा। लेकिन चौरी-चोरा में हुई हिंसक घटना ने गांधी जी को यह आंदोलन वापस लेने पर मजबूर कर दिया।

नमक आंदोलन

मार्च 1930 में गांधी जी ने अपने कुछ अनुयायियों के साथ मिलकर इस आंदोलन को शुरू किया। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य नमक पर अंग्रेजो द्वारा लगाए जाने वाले कर का विरोध करना था। यह आंदोलन बहुत ही व्यापक और सफल भी रहा। अंग्रेजो ने इस आंदोलन के बाद 60,000 लोगो को जेल में डाला था।

भारत की आजादी और देश का विभाजन

भारत छोड़ो आंदोलन की सफलता तो व्यापक नही थी, पर अंग्रेजो के द्वारा किये गए दमन से देश संगठित हो गया था। इसके बाद ब्रिटिश शासन ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह जल्द ही सत्ता भारतीयों के हाथो सौप देगा। देश में उस दौरान कुछ ऐसी विपरीत परिस्थितियां निर्मित हो चुकी थी, जिससे हिन्दू और मुसलमान के बीच हिंसा बढ़ रही थी। 1948 तक देश के लगभग 5000 लोग को मौत के घाट उतारा गया। उसी दौरान देश मे विभाजन की लहर भी दौड़ रही थी। पर महात्मा गांधी देश के विभाजन के सख्त खिलाफ थे। वही कांग्रेस के नेता मुहम्मद अली जिन्ना, बहुत से हिन्दू, मुस्लिम, सिख भी बंटवारें के पक्ष में थे। अंततः गांधी जी को मजबूर होकर विभाजन की सहमति देनी पड़ी।

महात्मा गांधी जी द्धारा लिखी गईं किताबें

महात्मा गांधी जी एक महान स्वतंत्रता सेनानी, अच्छे राजनेता ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन लेखक भी थे। उन्होंने अपने लेखन कौशल से देश के स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के संघर्ष का बेहद शानदार वर्णन किया है। उन्होंने अपनी किताबों में स्वास्थ्य, धर्म, समाजिक सुधार, ग्रामीण सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर लिखा है। उनके द्धारा लिखी गईं कुछ प्रमुख किताबों के नाम निम्नलिखित हैं-

  • हिन्दी स्वराज (1909)
  • मेरे सपनों का भारत (India of my Dreams)
  • ग्राम स्वराज (Village Swaraj by Mahatma Gandhi)
  • दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह (Satyagraha in South Africa)
  • एक आत्मकथा या सत्य के साथ मेरे प्रयोग की कहानी (An Autobiography or The Story of My Experiments with Truth (1927)
  • स्वास्थ्य की कुंजी (Key To Health)
  • हे भगवान (My God)
  • मेरा धर्म(My Religion)
  • सच्चाई भगवान है( Truth is God)

इसके अलावा गांधी जी ने कई और किताबें लिखी हैं, जो न सिर्फ समाज की सच्चाई को बयां करती हैं, बल्कि उनकी दूरदर्शिता को भी प्रदर्शित करती हैं।

महात्मा गांधी के आंदोलनों की खास बातें –

महात्मा गांधी की तरफ से चलाए गए सभी आंदोलनों में कुछ चीजें एक सामान थी जो कि निम्न प्रकार हैं –

  • 1 गांधी जी के सभी आंदोलन शांति से चलाए गए।
  • 2 आंदोलन के दौरान किसी की तरह की हिंसात्मक गतिविधि होने की वजह से ये आंदोलन रद्द कर दिए जाते थे।
  • 3 आंदोलन सत्य और अहिंसा के बल पर चलाए जाते थे।

महात्मा गांधी जी के स्लोगन

सादा जीवन, उच्च विचार वाले महान व्यक्तित्व महात्मा गांधी जी के ने अपने कुछ महान विचारों से प्रभावशाली स्लोगन दिए हैं। महात्मा गांधी जी के कुछ लोकप्रिय स्लोगन इस प्रकार हैं-

  • आपका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि आज आप क्या कर रहे हैं- महात्मा गांधी
  • करो या मरो- महात्मा गांधी
  • शक्ति शारीरिक क्षमता से नहीं आती है, यह एक अदम्य इच्छा शक्ति से आती है- महात्मा गांधी
  • पहले वो आप पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हंसेगें, और फिर वो आपसे लड़ेंगे तब आप निश्चय ही जीत जाएंगे – महात्मा गांधी
  • अपना जीवन कुछ इस तरह जियो जैसे की तुम कल मरने वाले हो, कुछ ऐसे सीखो जैसे कि तुम हमेशा के लिए जीने वाले हो- महात्मा गांधी
  • कानों का दुरुपयोग मन को दूषित एवं अशांत करता है- महात्मा गांधी
  • सत्य कभी भी ऐसे कारण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता जो कि उचित हो-महात्मा गांधी
  • भगवान का कोई धर्म नहीं है- महात्मा गांधी
  • ख़ुशी तब ही मिलेगी जब आप, जो भी सोचते हैं, जो भी कहते हैं और जो भी करते हैं, वो सब एक सामंजस्य में हों- महात्मा गांधी
  • “बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो!”

महात्मा गांधी की हत्या

“30 जनवरी, 1948 को, 78 वर्षीय गांधी की नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी, जो गांधी द्वारा मुसलमानों की सहिष्णुता पर नाराज था”।बार-बार भूख हड़ताल से कमजोर, गांधी अपनी दो भतीजीओं के साथ थे जो उन्हें नई दिल्ली के बिड़ला हाउस में अपने रहने वाले क्वार्टर से दोपहर की प्रार्थना सभा में ले जा रहीं थी । गोडसे ने महात्मा गाँधी को सेमीआटोमैटिक पिस्टल से उन्हें तीन बार गोली मारी ।इस हिंसक कृत्य ने एक शांतिवादी का जीवन ले लिया जिसने अपना पूरा जीवन अहिंसा का प्रचार करने में बिताया। गोडसे और एक सह-षड्यंत्रकारी को नवंबर 1949 में फाँसी पर लटका दिया गया था। अतिरिक्त षड्यंत्रकारियों को जेल की सजा दी गई थी।

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