मिल्खा सिंह “द फ्लाइंग सिख” की जीवनी

Milkha singh

मैं तब तक नहीं रुकता जब तक मैं अपने पसीने से एक बाल्टी नहीं भर लेता। मैं खुद को इतना धक्का दूंगा कि अंत में मैं गिर जाऊंगा और मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा, मैं भगवान से मुझे बचाने के लिए प्रार्थना करूंगा, वादा करता हूं कि मैं भविष्य में और अधिक सावधान रहूंगा। और मुझे मौक़ा मिला तब मैं इसे फिर से करना चाहूँगा।

मिल्खा सिंह जिन्हें “Flying Sikh” के नाम से भी जाना जाता है, उन्हें कौन नहीं जानता। मिल्खा सिंह आज तक भारत के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित धावक हैं। कामनवेल्थ खेलो में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाले वे पहले भारतीय है। खेलो में उनके अतुल्य योगदान के लिये भारत सरकार ने उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्म श्री से भी सम्मानित किया है। मिल्खा सिंह भारत के उन सफलतम track athletes में से एक हैं जिन्होंने की बहुत से छोटे समय से जीवन जीने का मंत्र सीख लिया था। उन्हें बचपन में हुए हादसे ने बहुत कुछ सीखा दिया था, जो की बाद में उन्हें उन बुलंदीयों तक पहुँचने में मदद करी जो की एक समय में उनका सपना हुआ करता था।

जीवन से जुड़ी विशेष जानकारी, समर्पण सहित आगामी विचार व्यवस्था –

नाम मिल्खा सिंह
जन्म• 20 November 1929 (ये data पाकिस्तान द्वारा दिया गया है)
• 17 October 1935 और 20 November 1935 (दूसरे official records के अनुसार)
जन्म्स्थान गोविंदपुरी, मुजफ्फरगढ़ शहर, पंजाब प्रांत, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 18 June 2021
मृत्यु का स्थान पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ आयु (मृत्यु के समय) 91 वर्ष
पत्नी निर्मल कौर
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री (1959), एशियाई खेलों (1958), (1962), कॉमनवेल्थ खेलों (1958)
नागरिकता भारतीय
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मिल्खा सिंह का प्रारंभिक जीवन

मिल्खा सिंह का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब में एक सिख राठौर परिवार में 20 नवम्बर 1929 को हुआ था। अपने माँ-बाप की कुल 15 संतानों में वह एक थे। उनके कई भाई-बहन बाल्यकाल में ही गुजर गए थे। भारत के विभाजन के बाद हुए दंगों में मिल्खा सिंह ने अपने माँ-बाप और भाई-बहन खो दिया। अंततः वे शरणार्थी बन के ट्रेन द्वारा पाकिस्तान से दिल्ली आए। दिल्ली में वह अपनी शदी-शुदा बहन के घर पर कुछ दिन रहे। कुछ समय शरणार्थी शिविरों में रहने के बाद वह दिल्ली के शाहदरा इलाके में एक पुनर्स्थापित बस्ती में भी रहे।

ऐसे भयानक हादसे के बाद उनके ह्रदय पर गहरा आघात लगा था। अपने भाई मलखान के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया और चौथी कोशिश के बाद सन 1951 में सेना में भर्ती हो गए। बचपन में वह घर से स्कूल और स्कूल से घर की 10 किलोमीटर की दूरी दौड़ कर पूरी करते थे और भर्ती के वक़्त क्रॉस-कंट्री रेस में छठे स्थान पर आये थे इसलिए सेना ने उन्हें खेलकूद में स्पेशल ट्रेनिंग के लिए चुना था।

मिल्खा सिंह का पारिवारिक जीवन

मिल्खा सिंह ने भारतीय महिला वॉलीबॉल के पूर्व कप्तान निर्मल कौर से सन 1962 में विवाह किया। कौर से उनकी मुलाकात सन 1955 में श्री लंका में हुई थी। इनके तीन बेटियां और एक बेटा है। इनका बेटा जीव मिल्खा सिंह एक मशहूर गोल्फ खिलाडी है। सन 1999 में मिल्खा ने शहीद हवलदार बिक्रम सिंह के सात वर्षीय पुत्र को गोद लिया था। मिल्खा सम्प्रति में चंडीगढ़ शहर में रहते हैं।

मिल्खा सिंह का करियर

साल 1958 के एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह के बेहतरीन प्रदर्शन के बाद सेना ने मिल्खा सिंह को जूनियर कमीशंड ऑफिरसर के तौर पर प्रमोशन कर सम्मानित किया। बाद में उन्हें पंजाब के शिक्षा विभाग में खेल निदेशक के पद पर नियुक्त किया गया। और इसी पद पर मिल्खा सिंह साल 1998 में रिटायर्ड हुए।

मिल्खा सिंह ने रोम के 1960 ग्रीष्म ओलंपिक और टोक्यो के 1964 ग्रीष्म ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। जिसके बाद जनरल अयूब खान ने उन्हें “उड़न सिख” कह कर पुकारा। उनको “उड़न सिख” का उपनाम दिया गया था। आपको बता दें कि 1960 के रोम ओलंपिक खेलों में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर की दौड़ में 40 सालों के रिकॉर्ड को जरूर तोड़ा था, लेकिन दुर्भाग्यवश वे पदक पाने से वंचित रह गए और उन्हें चौथा स्थान प्राप्त हुआ था। अपनी इस असफलता के बाद मिल्खा सिंह इतने नर्वस हो गए थे।

उन्होंने दौड़ से संयास लेने का मन लिया, लेकिन फिर बाद में दिग्गज एथलीटों द्धारा समझाने के बाद उन्होंने मैदान में शानदार वापसी की। इसके बाद साल 1962 में देश के महान एथलीट जकार्ता में हुए एशियन गेम्स में 400 मीटर और 4 X 400 मीटर रिले दौड़ में गोल्ड मैडल जीतकर देश का अभिमान बढ़ाया। साल 1998 में मिल्खा सिंह द्धारा रोम ओलंपिक में बनाए रिकॉर्ड को धावक परमजीत सिंह ने तोड़ा।

मिल्खा सिंह जी का नाम ‘The Flying Sikh’ कैसे पड़ा?

मिल्खा सिंह जी का नाम ‘The Flying Sikh’ पड़ने के पीछे की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। ये बात सन 1962 की है, जब पाकिस्तान में एक रेस अनुस्तिथ किया गया। जिसमें अब्दुल खालकी ने हिस्सा लिया था और उन्हें मुख्य दावेदार माना जा रहा था। ऐसा इसलिए क्यूँकि उन्होंने इससे पहले ही Tokyo Asian Games में 100 metres की दौड़ में गोल्ड जीता हुआ था। इस रेस में मिल्खा सिंह जी ने भी हिस्सा लिया था, वहीं उनका काफ़ी मज़ाक़ उड़ाया जा रहा था। लेकिन तक़दीर में कुछ और होने वाला था। आप यक़ीन नहीं मानेंगे की मिल्खा सिंह ने इस दौड़ में ऐसी दौड़ लगायी की मानो को दौड़ नहीं रहे बल्कि उड़ रहे थे। इस चीज़ को देखने के बाद उस समय के पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान जी ने ही मिल्खा सिंह का नाम ‘The Flying Sikh” रखा था। उसके बाद से वो इस नाम से खूब परिचित भी हो गए थे।

मिल्खा सिंह के शानदार रिकॉर्ड्स और उपलब्धियां –

  • साल 1957 में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर की दौड़ में 47.5 सेकंड का एक नया रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज किया।
  • 1958 में मिल्खा सिंह ने टोकियो जापान में आयोजित तीसरे एशियाई खेलो मे 400 और 200 मीटर की दौड़ में दो नए रिकॉर्ड स्थापित किए और गोल्ड मैडल जीतकर देश का मान बढ़ाया, इसके साथ ही साल 1958 में ही ब्रिटेन के कार्डिफ में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गोल्ड मैडल जीता।
  • साल 1959 में भारत सरकार ने मिल्खा सिंह की अद्वितीय खेल प्रतिभा और उनकी उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया।
  • 1959 में इंडोनेशिया में हुए चौथे एशियाई खेलो में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर दौड़ में गोल्ड मैडल जीतकर नया कीर्तमान स्थापनित किया।
  • साल 1960 में रोम ओलिंपिक खेलों में मिल्खा सिंह 400 मीटर की दौड़ का रिकॉर्ड तोड़कर एक राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किया; आपको बता दें कि उन्होंने यह रिकॉर्ड 40 साल बाद तोड़ा था।
  • 1962 में मिल्खा सिंह ने एशियाई खेलो में गोल्ड मैडल जीतकर एक बार फिर से देश का सिर फक्र से ऊंचा किया।
  • साल 2012 में रोम ओलंपिक के 400 मीटर की दौड़ मे पहने जूते मिल्खा सिंह ने एक चैरिटी संस्था को नीलामी में दे दिया था।
  • 1 जुलाई 2012 को उन्हें भारत का सबसे सफल धावक माना गया जिन्होंने ओलंपिक्स खेलो में लगभग 20 पदक अपने नाम किये है, यह अपनेआप में ही एक रिकॉर्ड है।
  • मिल्खा सिंह ने अपने जीते गए सभी पदकों कों देश के नाम समर्पित कर दिया था, पहले उनके मैडल्स को जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में रखा गया था, लेकिन फिर बाद में पटियाला के एक गेम्स म्यूजियम में मिल्खा सिंह को मिले मैडल्स को ट्रांसफर कर दिया गया।

मिल्खा सिंह जी की रेटायअर्मेंट के बाद की ज़िंदगी

जीवन के प्रारंभिक चरण के दौरान उनके संघर्षों ने उन्हें सभी बाधाओं के खिलाफ खड़े होने और जीत का पीछा करने के लिए दौड़ते हुए असफलता के सामने कभी नहीं झुकने के लिए पर्याप्त मजबूत बनाया। एक खिलाड़ी के जीवन में दबाव हमेशा बना रहता है; आपको इससे निपटना सीखना होगा।

मिल्खा सिंह की अवार्ड –

  • 1958 के ही एशियाई खेलो में उन्होंने 200 मीटर और 400 मीटर दोनों में ही क्रमशः6 सेकंड, और 47 सेकंड का समय लेते हुए स्वर्ण पदक जीता।
  • 1958 के कामनवेल्थ खेलो में उन्होंने 400 मीटर रेस16 सेकंड में पूरी करते हुए गोल्ड मेडल जीता। उस समय आज़ाद भारत में कॉमनवेल्थ खेलों में भारत को स्वर्ण पदक जीताने वाले वे पहले भारतीय थे।
  • 1958 के एशियाई खेलों में भारी सफलता हासिल करने के बाद उन्हें आर्मी में जूनियर कमीशन का पद मिला।

मिल्खा सिंह की मृत्यु

पूर्व भारतीय ट्रैक और फील्ड धावक मिल्खा सिंह का 18/6/2021 के दिन शुक्रवार को COVID-19 के साथ एक महीने की लंबी बीमारी के कारण चंडीगढ में निधन हो गया है। मिल्खा सिंह पद्म श्री पुरस्कार विजेता और मौत के समय मिल्खा सिंह की आयु 91 वर्ष थी। उनके परिवार ने बताया की उनकी मौत रात 11.30 बजे चंडीगढ़ में हुई थी। उन्हें पीजीआईएमईआर अस्पताल में भर्ती किया गया था। बुखार और ऑक्सीजन जटिलताएं विकसित होने से हालत गंभीर हो गई थी । जिसके चलते सामान्य आईसीयू में स्थानांतरित किया गया था। उनकी पत्नी निर्मल कौर का निधन भी वायरस संक्रमण से रविवार को मोहाली के एक निजी अस्पताल में हुई है।

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