दक्षिण भारत के महान कवि “सुब्रमण्यम भारती” का जीवन परिचय

Subramanyam Bharti

सुब्रमण्यम भारती कौन है?

सुब्रमण्यम भारती (1882-1921) दक्षिण भारत के महान कवि, समाज सुधारक व स्वतंत्रता सेनानी है। जिन्होंने अपनी देश भक्तिपूर्ण गीतों व कविताओं के द्वारा मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के लिए समर्पित देशभक्तों की रगो व मन मस्तिष्क में एक नए उत्साह व जोश को बढ़ावा दिया।

जीवन से जुड़ी विशेष जानकारी, समर्पण सहित आगामी विचार व्यवस्था –

पूरा नाम सुब्रह्मण्य भारती
अन्य नाम महाकवि भरतियार
जन्म 11 दिसम्बर, 1882
जन्म भूमि गाँव एट्टियपुरम, तमिलनाडु
मृत्यु 11 सितम्बर, 1921चेन्नई
कर्म-क्षेत्र तमिल काव्य
मुख्य रचनाएँ ‘स्वदेश मित्रम’, ‘चक्रवर्तिनी’, ‘इण्डिया’, ‘सूर्योदयम’, ‘कर्मयोगी’ आदि।
राष्ट्रीयताभारतीय

सुब्रमण्यम भारती का आरंभिक जीवन

सुब्रमण्यम का जन्म तमिलनाडु के शिवयेरी ग्राम में सन् 1882 ई. को हुआ। इनके पिता चिन्नास्वामी तमिल भाषा के प्रकांड पंडित थे, जिनका एटअपुरम दरबार में मान था। सुब्रह्राण्यम् बचपन से ही कविता करने लगे थे। ग्यारह वर्ष की अवस्था में इनकी काव्य प्रतिभा देखकर विद्वानों ने इन्हें ‘भारती’ की उपाधि दी। पाँच वर्ष की अवस्था में ही माँ के मरने पर दूसरी माँ ने इन्हें और इनकी बहन भागीरथी को माँ जैसा प्यार दिया। पिता के मरने पर चौदह वर्ष के बालक भारती के लिए परिवार चलाना दुरूह हो गया। निर्धनता की मार्मिक अनुभूति इनकी कविता ‘धन की महिमा’ में व्यक्त हुई।

सुब्रमण्यम भारती की शिक्षा

भारती ने वाराणसी जाकर हिन्दी, संस्कृत का अध्ययन किया। अँग्रेजी की शिक्षा पिता के समय में ही तिरुवेलवेली के अँग्रेजी स्कूल में प्राप्त की। हिन्दी को ये देश की एकता के लिए सक्षम समझते थे। वाराणसी में इन्होंने काशी क्षेत्र तथा वहाँ की संस्कृति का अध्ययन किया। एक वर्ष के बाद ये फिर अपने गाँव में आकर साहित्य साधनारत हो गए। इन्हें स्वच्छन्तावादी कविताएँ पसन्द थीं। शैली के नाम पर इन्होंने अपना उपनाम ‘शैल्लिदासन’ रख लिया था। इन्होंने अँग्रेजी कविताओं का तमिल में अनुवाद किया।

सुब्रमण्यम भारती का पारिवारिक जीवन

भारती की माँ की मृत्यु के पश्चात चिन्नास्वामी अय्यर ने दूसरी शादी कर ली और कुछ ही समय बाद 1898 में अय्यर की मृत्यु हो गई। इस समय भारती की आयु 16 वर्ष थी, 1897 में भारती ने अपनी चचेरी बहन चेल्लमल के साथ विवाह किया और बाद में ये वाराणसी अपनी बुआ के घर चले गये तथा यहाँ रहकर इन्होने हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओँ का अध्ययन किया। बनारस का भारती के जीवन में बड़ा योगदान रहा, यहाँ आकर न केवल इन्होने कई भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया बल्कि इलाहाबाद प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की, यही उन्होंने एनी बेसेंट का लेक्चरर सुना और इलाहबाद में रहते हुए पगड़ी पहननी शुरू की।

1902 में सुब्रमण्यम भारती ने जीविकोपार्जन के उद्देश्य से इटैयापुरम् में अध्यापन का कार्य शुरू कर दिया। इस दौरान भारती जी अंग्रेजी काव्य पुस्तकों का गहन अध्ययन करते रहे तथा उपनाम शैली दर्शन से समाचार पत्रों में लेख लिखते रहे।

सुब्रमण्य भारती की भाषा‌शैली

भारती अपनी मातृभाषा तमिल भाषा के प्रति समर्पित थे और उन्हें अपनी विरासत पर गर्व था। भारती तेलुगु, बंगाली, हिंदी, संस्कृत, कच्छी, फ्रेंच और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में पारंगत थे और अक्सर अन्य भाषाओं से तमिल में अनुवादित कार्यों का अनुवाद करते थे। भारती को प्राचीन और समकालीन तमिल साहित्य विशेषकर प्राचीन कविताओं को सीखने की तीव्र भूख थी।

स्वतंत्रता आंदोलन में ‘सुब्रमण्यम भारती’ की भूमिका

  • 1905 से भारती सक्रिय रूप से स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने लगे। इस बिच बहुत से राष्ट्रभक्तों व आध्यात्मिक नेताओं के सम्पर्क में आने के बाद वह बहुत प्रभावित हुए।
  • सुब्रमण्यम भारती ने बहुत से महान नेताओं जैसे तिलक, गोखले आदि पर भावमयी व प्रेरणायुक्त कविताएँ लिखी।
  • 1906 में सुब्रमण्यम भारती सिस्टर निवेदिता के सम्पर्क में आए तथा बाद में मंडायम बंधुओं, एस तिरुमालाचारी तथा एस. श्रीनिवासचारी व वी. कृष्णास्वामी अय्यर से भी उन्होंने प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाए।
  • इंडिया के संपादक के रूप में तथा अंग्रेजी साप्ताहिक बाल भारती में उनके क्रन्तिकारी लेखों की धूम के कारण अंग्रेजी सरकार बौखला गई।

सुब्रमण्य भारती का “इनोवेशन इन तमिल पोएट्री”

भारती तमिल कविता की एक नई शैली को पेश करने में अग्रणी थे। तब तक कविताओं को प्राचीन तमिल व्याकरणिक ग्रंथ तोल्काप्पियम द्वारा निर्धारित सख्त वाक्य-विन्यास नियमों का पालन करना पड़ता था। भारती ने इस वाक्य-विन्यास के बंधन को तोड़ दिया और एक गद्य-काव्य शैली का निर्माण किया जिसे पुथुकविथाई (आधुनिक कविता) के रूप में जाना जाता है।

सुब्रमण्यम भारती की कविताएँ

वर्ष 1908 में उनकी पहली कविता की पुस्तक सांग्स ऑफ फ्रीडम प्रकाशित हुई, जो कि केवल एक उनकी साहित्यिक उपलब्धि ही नही थी, बल्कि विदेशी शासन की दासता को तोड़ने के लिए प्रबल रूप से एक आव्हान भी था। इस प्रकार भारती ने मद्रास में स्वाधीनता आंदोलन में एक नयी जान फूक दी। सुब्रमण्यम भारती गिरफ्तारी से बचने के लिए पांडिचेरी चले गये। वहां उनके द्वारा जीवन के बिताये गये 10 वर्ष कविताएँ रचने में व्यतीत हुए। यहाँ भी भारती ब्रिटिश सरकार का प्रबल रूप में विरोध करते हुए वह श्री अरबिंद व वी वी एस अय्यर से संपर्क बनाए रहे। 1918 में भारती की कड्डलोर के नजदीक गिरफ्तार कर लिया गया। अगले वर्ष वह मद्रास में गांधी से मिले तथा उन्होंने गांधी को महात्मा गांधी नामक कविता समर्पित की।

यह है भारत देश हमाराजय भारतसब शत्रुभाव मिट जाएँगेचलो गाएँ हमवन्देमातरमरे विदेशियो! भेद न हममें‌निर्भयवंदे मातरम्‌नमन करें इस देश कोभारत सर्वोत्कृष्ट देश है

सुब्रमण्यम भारती (विशेष)

सुब्रह्मण्य भारती का प्रिय गान बंकिम चन्द्र का वन्दे मातरम् था। यह गान उनका जीवन प्राण बन गया था। उन्होंने इस गीत का उसी लय में तमिल में पद्यानुवाद किया, जो आगे चलकर तमिलनाडु के घर-घर में गूँज उठा। सुब्रह्मण्य भारती ने माता-पिता को खोने के दु:ख को अपने काव्य में ढाल लिया। इससे उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। स्थानीय सामन्त के दरबार में उनका सम्मान हुआ और उन्हें ‘भारती’ की उपाधि दी गयी।

सुब्रह्मण्य भारती की रचनाएँ

तमिल कविता हिन्दी मेंजीवनी सुब्रह्मण्य भारती : मंगला रामचंद्रन।

सुब्रमण्यम भारती की मृत्यु

भारती स्वभाव से दानी थे। इनकी दानशीलता की अनेक कथाएँ आज भी तमिलनाडु में प्रचलित हैं। भारती बच्चों से बहुत स्नेह करते थे और कभी-कभी बच्चों जैसा आचरण भी करने लगते थे। पागल हाथी को गन्ना और नारियल खिलाते समय उसके धक्के से ये बेहोश हो गए। अस्पताल में बीमार रहकर 12 दिसम्बर, 1922 ई. को इनका निधन हो गया।

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