उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां का जीवन परिचय

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां एक प्रख्यात भारतीय शहनाई वादक थे। जिनकी शहनाई को भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में पहचान दिलाने में अपना जीवन समर्पित किया। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ऐसे शख्स है जिन्होंने संगीत के इस पावन उपकरण शहनाई को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। बिस्मिल्लाह ख़ां जी को संगीत के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए वर्ष 2001 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया था। यही नहीं बिस्मिल्लाह खां ही वो शख्सियत थे, जिन्होंने 15 अगस्त, 1947 में अपनी शहनाई की मधुर धुन के साथ आजादी का स्वागत किया था, और तब से स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले पर प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह खां का शहनाई वादन एक परंपरा बन गई है। तो आइए जानते हैं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का जीवन परिचय ( biography of ustad Bismillah Khan )

बिस्मिल्लाह खां का जन्म व प्रारंभिक शिक्षा

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संगीतकारों में से एक बिस्मिल्लाह खां का जन्म 21 मार्च , 1916 को बिहार के डुमरांव गांव में हुआ था। बचपन में उनका नाम कमरुद्धीन था, लेकिन बाद में उनके दादा रसूल बख्श के नाम पर उनका नाम भी ‘बिस्मिल्लाह’ रख दिया था, उनका परिवार उनके पिछली 5 पीढ़ियों से शहनाई वादन का प्रतिवादक रहा है। वहीं उनके पूर्वज बिहार के भोजुपर रजवाड़े में दरबारी संगीतकार भी थे महज 6 साल की उम्र में ही बिस्मिल्लाह खां अपने पिता पैंगमर खां के साथ बनारस आ गए। वहां उन्होंने अपने चाचा अली बख्श ‘विलायतु’ से शहनाई बजाना सीखा।आपको बता दें कि उनके उस्ताद चाचा काशी विश्वनाथ मन्दिर में शहनाई-वादन का काम करते थे। वहीं उनके पिता भी डुमराव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिह के दरबार में शहनाई वादक थे। इसलिए बिस्मिल्लाह जी के बारे में यह कहा जा सकता है कि उस्ताद को शहनाई वादन की कला अपने परिवार से विरसात में मिली थी, क्योंकि शुरु से ही उनके परिवार के लोग दरबारी राग बजाने में उस्ताद थे।

पूरा नाम उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ
जन्म21 मार्च 1916
जन्म स्थानडुमरांव गांव, बिहार
पितापैंगबर ख़ाँ
माता का नाममितन खां
स्कूल‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय’ और ‘शांतिनिकेतन
पुरस्कार-उपाधि ‘भारत रत्न’, ‘पद्म भूषण’, ‘पद्म श्री’, ‘पद्म विभूषण’, ‘तानसेन पुरस्कार’,’रोस्टम पुरस्कार’,
मृत्यु21 अगस्त, 2006

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का करियर

करियरबिस्मिल्ला खाँ ने अपने करियर की शुरुआत विभिन्न स्टेज शो में प्रदर्शन कर की थी। उनका पहला प्रदर्शन 1937 में हुआ, जब उन्होंने कलकत्ता में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में एक संगीत कार्यक्रम में अभिनय किया। इस प्रदर्शन ने शहनाई को सुर्खियों में ला दिया और संगीत प्रेमियों द्वारा बहुत सराहना की गई।उसके बाद वह अफगानिस्तान, अमेरिका, कनाडा, बांग्लादेश, ईरान, इराक, पश्चिम अफ्रीका, जापान, हांगकांग और यूरोप के विभिन्न हिस्सों सहित कई देशों में शहनाई बजाने गया। अपने शानदार करियर के दौरान उन्होंने दुनिया भर में कई प्रमुख अवसरों पर शहनाई वादन किया। मॉन्ट्रियल में विश्व प्रदर्शनी में शामिल होने वाले कुछ कार्यक्रम, कान कला महोत्सव और ओसाका व्यापार मेला आदि कुछ मुख्य कार्यक्रम थे।

सिनेमा के साथ उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का प्यार

गूंज उठी शहनाई – हिंदी फिल्म j गूंज उठी शहनाई ’में खुद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई गायन था। अब्दुल हलीम जफ़र खान और आमिर खान जैसे अन्य प्रसिद्ध संगीतकारों के गायन के साथ, फिल्म एक ब्लॉकबस्टर बन गई। इसका संगीत वसंत देसाई ने तैयार किया था ।

सनादी अप्पन्ना – 1977 में, वाराणसी के उस्ताद ने चेन्नई में प्रसाद स्टूडियो के लिए कन्नड़ फिल्म पर काम करने के लिए सनादी अप्पन्ना ’शीर्षक से काम किया। उन्होंने अपनी मंडली के साथ नौ दिन बिताए, जिसमें दस सदस्य शामिल थे। उन्होंने फिल्म पर काम करने का फैसला किया था, इसके मुख्य चरित्र के रूप में, डॉ। राजकुमार द्वारा निभाई गई, एक ग्रामीण शहनाई कलाकार थी। बिस्मिल्लाह खान की प्रतिभा ने फिल्म के प्रमुख भाग का निर्माण किया, जिसका संगीत जी केके वेंकटेश ने तैयार किया था।

संगे मिल से मुलाक़ात – ‘संगीमेल से मुलाक़ात’ बिस्मिल्ला खां के जीवन पर आधारित फिल्म है, जो गौतम घोष द्वारा निर्देशित है। फिल्म में उस्ताद को प्रदर्शित किया जाता है और एक युवा शहनाई वादक से भारत के सर्वश्रेष्ठ में से एक के रूप बनने की उसकी यात्रा को दर्शाता है।

सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक के रुप में बनाई पहचान –महान शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां Ustad Bismillah Khan ने महज 14 साल की छोटी सी उम्र में पहली बार इलाहाबाद के संगीत परिषद् में शहनाई बजाने का कार्यक्रम किया था, जिसके बाद बेहद कम समय में उन्होंने अपनी शहनाई बजाने की अलौकिक प्रतिभा को निखारा और सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक के रुप में अपनी पहचान बनाई।

बिस्मिल्लाह खां ने ‘बजरी’, ‘झूला’, ‘चैती’ जैसी प्रतिष्ठित लोकधुनों में बाजे को अपनी कठोर तपस्या के बल पर शहनाई वादन को संवारा एवं क्लासिकल मौसिक़ी में शहनाई को संगीत की दुनिया में सम्मानजनक स्थान दिलवाई। वहीं जिस जमाने में बिस्मिल्लाह खां जी शहनाई वादक के रुप में खुद को उभार रहे थे, उस दौर में संगीतकारों को उतना महत्व नहीं दिया जाता था।हालांकि उनके परिवार का शुरु से ही संगीत से जुड़ा रहना और उनकी शहनाई वादन में दिलचस्पी की वजह से ही उन्होंने न सिर्फ खुद को एक प्रसिद्ध शहनाई वादक के रुप में स्थापित किया बल्कि शहनाई को भी संगीत की दुनिया में एक अलग पहचान दिलवाई। वहीं बिस्मिल्लाह खां जी के संगीत बजाने की अद्भुत प्रतिभा को देखते हुए शांतिनिकेतन और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा था।

बिस्मिल्लाह खां का प्रमुख योगदान

15 अगस्त, 1947 में देश की आजादी के पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहराकर आजादी का जश्न मनाया जा रहा है, तब बिस्मिल्लाह ख़ां जी ने अपनी मर्मस्पर्शी शहनाई बजाकर भारत की आजादी का स्वागत किया था। वहीं तब से लेकर हर साल 15 अगस्त यानी स्वतंत्र दिवस को दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का शहनाई वादन परंपरा बन गई है।

उत्साह बिस्मिल्लाह खान को मिले पुरस्कार और उपलब्धियां

  • भारत रत्न – 2001 में, बिस्मिल्लाह खान को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।
  • पद्म विभूषण – 1980 में, उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया, जो देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है।
  • पद्म भूषण – भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार उन्हें वर्ष 1968 में दिया गया था।
  • पद्म श्री – वर्ष 1961 में, बिस्मिल्ला खान को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार – यह पुरस्कार उन्हें भारत के राष्ट्रीय संगीत अकादमी, नृत्य और नाटक द्वारा वर्ष 1956 में दिया गया था।
  • तानसेन पुरस्कार – मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए तानसेन पुरस्कार से सम्मानित किया।
  • तलार मौसिकी – यह पुरस्कार उन्हें वर्ष 1992 में ईरान गणराज्य द्वारा दिया गया था।
  • व्यक्तिगत जीवन और परिवार

बिस्मिल्ला ख़ाँ के मशहूर एल्बम और लाइव शो

  • दुनिया के महान शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां जी ने कई फिल्मों में भी अपना संगीत देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
  • बिस्मिल्लाह खां ने जी कन्नड़ फिल्म सनादी अपत्रा में राजकुमार के किरदार के लिये शहनाई बजाई थी।
  • साल 1959 में फिल्म गूंज उठी शेनाई के लिए भी बिस्मिल्लाह खां ने अपनी शहनाई की धुन दी थी।
  • साल 1994 में मेस्ट्रो च्वॉइस में भी बिस्मिल्लाह खां ने अपनी शहनाई की धुन दी थी।
  • साल 1994 में मेघ मल्हार, वोल में भी बिस्मिल्लाह खां ने अपनी शहनाई की धुन दी थी।
  • साल 2000 में बिस्मिल्लाह खां जी ने क्वीन एलिज़ाबेथ हॉल में लाइव शो देकर हजारों दर्शकों को अपनी मधुर शहनाई से मंत्रमुग्ध किया था।
  • साल 2000 में बिस्मिल्लाह खां ने लन्दन में लाइव परफॉरमेंस, वोल में भी अपनी शहनाई की धुन दी थी।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की मृत्यु

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की मृत्युसंगीत की दुनिया में शहनाई को अलग पहचान दिलवाने वाले बिस्मिलाह खां न सिर्फ शहनाई बजाने में उस्ताद थे, बल्कि वे अपने दरियादिली के भी जाने जाते थे, वे शहनाई बजाकर संगीतकार के रुप में जो भी कमाते थे, उससे या तो लोगों की मद्द कर देते थे, या फिर अपने बड़े परिवार के भरण-पोषण में खर्च कर देते थे।वे अपने लिए कभी भी नहीं सोचते थे, हालांकि इसी वजह से उन्हें आर्थिक मुसीबतों का भी सामना करना पड़ा था। जिसके बाद सरकार को उनकी मद्द के लिए आगे आना पड़ा था। उस्ताद ने अपने जीवन के आखिरी दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी, और 21 अगस्‍त, साल 2006 में इस दुनिया को अलविदा कहकर चले गए थे।

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