दुनिया के मशहूर उपन्यासकार आर के नारायण की जीवनी

R.K Narayan

आर के नारायण अंग्रेजी साहित्य (English Literature) के भारतीय लेखकों में 3 सबसे महान् उपन्यासकारों में गिने जाते थे। बॉलीवुड के सुप्रसिद्ध अभिनेता देव आनंद ने आर के नारायण के उपन्यास ‘गाइड’ पर ‘गाइड’ के नाम से हिंदी और अंग्रेजी में फिल्म बनाई जो देश और विदेश में काफी चर्चित हुई थी।

जीवन से जुड़ी विशेष जानकारी, समर्पण सहित आगामी विचार व्यवस्था –

पूरा नाम राशीपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायणस्वामी
जन्म 27 अक्टूबर 1920
जन्म स्थान पेरुमथॉनम उझावूर गाँव, जिला त्रावणकोर, केरल
माता – पिता पुन्नाथठुरावीथी पप्पियाम्मा, कोचेरिल रमण विद्या
पत्नी उषा नारायण (1951)
राजनैतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
मृत्यु 9 नवम्बर 2005 (नई दिल्ली)

आर के नारायण का प्रारंभिक जीवन

10 अक्टूबर 1906 को चेन्नई में जन्में आर के नारायण का पूरा नाम राशीपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायणस्वामी था। बचपन के दिनों में आर के नारायण के परिवार के लोग उन्हें प्यार से कुंजप्पा कहकर बुलाता थे। बचपन के दिनों में आर के नारायण ज्यादातर अपनी नानी के घर रहे। बचपन से ही आर के नारायण को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। वह किताबों को पढ़ने के साथ-साथ लिखते भी थे।

आर के नारायण के पिता एक तमिल टीचर थे। आर के नारायण ने भी बहुत कम वक्त के लिए एक टीचर और पत्रकार के रूप में कार्य भी किया है, लेकिन उन्होंने इसके सिवा अपना सारा जीवन लेखन में ही लगाया। इसके लिए उन्होंने अपनी टीचर की नौकरी भी छोड़ दी थी। आर के नारायण की पहली उपन्यास लिखा था जिसका नाम ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ था।

आर के नारायण की शिक्षा

के आर नारायण की प्रारंभिक शिक्षा 1927 में उझावूर के अवर प्राथमिक विद्यालय में हुई थी। उस समय आने जाने का उचित साधन नहीं होता था, जिस वजह से शिक्षा के लिए उन्हें रोज 15 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था। के आर नारायण जी के पिता के पास इतनी राशि भी नहीं होती थी कि वे अपने बच्चों को स्कूल में दाखिला के लिए शिक्षा शुल्क दे सके, जिस वजह से बालक नारायण को हमेशा अपनी क्लास के बाहर खड़े हो कर ही शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती थी। के आर नारायण जी के पास किताबें खरदीने के लिए भी पैसे नहीं होते थे, वे अपने दोस्तों से किताबें ले कर नक़ल कर लेते थे। 1931 – 1935 तक, के आर नारायण ने आवर लेडी ऑफ़ लौरदे स्कूल से शिक्षा प्राप्त की।

सन 1937 में के आर नारायण जी ने सेंट मेर्री हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। स्कॉलरशिप की मदद से के आर नारायण जी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा कोट्टायम के सी. एम. एस. स्कूल से 1940 में पूरी की। 1943 में उन्होंने B.A (hons) एवं M.A English literature में त्रावणकोर विश्वविद्यालय से किया। वे पहले ऐसे दलित हे जिन्होंने फर्स्ट क्लास में अपनी डिग्री पूरी की।

के आर नारायण का करियर

1944-45 में के आर नारायण जी ने दी हिन्दू एवं दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पत्रकार के रूप में कार्य किया। इस दौरान 10 अप्रैल 1945 में उन्होंने महात्मा गांधी जी का इंटरव्यू भी लिया था। के आर नारायण जी को हमेशा से विदेश जा कर पढाई करने का मन था, किन्तु उनकी आर्थिक स्थिति उसकी इजाजत नहीं देती थी। स्कॉलरशिप का भी उस समय प्राबधान नहीं था, सो के आर नारायण जी ने जे आर डी टाटा को एक चिठ्ठी लिख कर मदद मांगी। टाटा ने उनकी मदद की और वे राजनीति विज्ञान की शिक्षा के लिए लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स चले गए।

1948 में वे भारत लौट आए और उनके प्रोफेसर लास्की ने उन्हें जवाहर लाल नेहरूजी से मिलवाया। नेहरूजी ने उन्हें आईऍफ़एस की नौकरी दिलवाई, फिर के आर नारायण जी 1949 में बर्मा चले गए। इस दौरान 1954 में दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में उन्होंने बच्चों को शिक्षा भी दी। 1978 में IFS के रूप में जब उनका कार्यकाल समाप्त हुआ, उसके बाद वे 1979 से 80 तक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में उपकुलपति रहे। इसके बाद 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जी ने उन्हें 1980 से 84 तक अमेरिका का भारतीय एम्बेसडर के लिए बना दिया।

के आर की नारायण राजनीतिक यात्रा –

इंदिरा जी के कहने पर उन्होंने 1984 में राजनीति में प्रवेश किया और लगातार तीन लोकसभा चुनावों में ओट्टापाल (केरल) में कांग्रेस की सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचे। 1985 में केआर नारायण को राजीव गांधी सरकार के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। उन्होंने योजना, विज्ञान, विदेश मामलों और प्रौद्योगिकी से संबंधित कार्य को संभाला। 1989 में जब कांग्रेस सत्ता से बाहर थी, तब केआर नारायण विपक्षी सांसद के रूप में उनका काम देखते थे। लेकिन 1991 में जब कांग्रेस सत्ता में आई तो नारायण जी को कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया।

राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के कार्यकाल के दौरान 1992 में केआर नारायण को उपाध्यक्ष बनाया गया था। 17 जुलाई 1997 को नारायण जी को राष्ट्रपति बनाया गया था। उन्होंने सर्वसम्मति से राष्ट्रपति पद जीता। राष्ट्रपति के कार्यकाल में उन्होंने दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीबों के लिए काफी काम किया. केआर नारायण का कार्यकाल 2002 में समाप्त हुआ था।

आर. के. नारायण की कुछ प्रमुख रचनाएं-

उपन्यास

  • ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ (1935)
  • द बैचलर ऑफ आर्ट्स (1937)
  • द डार्क रूम (1938)
  • द इंग्लिश टीचर (1945)
  • मिस्टर संपथ (1948)
  • द फाइनेंशियल एक्सपर्ट (1952)
  • वेटिंग फॉर द महात्मा (1955)
  • द गाइड (1958)
  • द मॉनिटर ऑफ मालगुडी (1961)
  • द वेंडर ऑफ स्वीट्स (1967)
  • टाल्केटिव मेन (1986)
  • द वर्ल्ड ऑफ नागराज (1990)
  • ग्रेन्डमदर्स टेल (1992)

लघु कहानियाँ-

  • मालगुडी डेज (1942)
  • एन एस्ट्रोलॉजर डे एंड अदर स्टोरीज (1947)
  • लॉली रोड एंड अदर स्टोरीज (1956)
  • ए हार्स एंड टू गोट्स (1970)
  • अंडर द बॅनियन ट्री एंड अदर स्टोरीज (1985)
  • द ग्रैंडमदर्स टेल एंड सिलेक्टेड स्टोरीज (1994)

अंग्रेजी विषय में फेल हुए आर के नारायण

जानकारी के लिए आपको बता दें कि अंग्रेजी उपन्यास की दुनिया में आर के नारायण पूरी दुनिया में मशहूर थे। लेकिन बहुत कम लोगों को जानकारी है कि वर्ष 1925 में महान उपन्यासकार आर के नारायण ग्रेजुएशन की परीक्षा में अंग्रेजी विषय में फेल हो गए थे। बाद में वह अंग्रेजी की परीक्षा देकर अंग्रेजी विषय में पास हुए। आर के नारायण ने कॉलेज के दिनों से ही लिखना शुरू कर दिया था। उनका पहला उपन्यास 1935 में ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ के नाम से था। 1935 में ही उनका ‘फाइनेंशियल एक्सपर्ट’ नामक हास्य उपन्यास प्रकाशित हुआ था।

आर के नारायण का पहला उपन्यास वर्ष 1935 में प्रकाशित हुआ

आर. के. नारायण ने अपना लेखन कार्य अंग्रेजी साहित्य में किया। उनका पहला उपन्यास ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ वर्ष 1935 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास एक स्कूली लड़के स्वामीनाथन के स्कूली जीवन की बेहद मनोरंजक घटनाओं पर लिखा गया। इसमें एक स्कूली लड़के की सामान्य शरारतों और उसके एवज में मिलने वाली सजाओं का वर्णन है। इसके बाद उनका वर्ष 1937 में ‘स्नातक’ (द बैचलर ऑफ आर्ट्स) उपन्यास प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने एक संवेदनशील युवक चंदन के माध्यम से उसकी पढ़ाई, प्रेम और विवाह संबंधी पश्चिमी विचारों का अपने सामाजिक ढांचे के बीच उठते सवालों को दर्शाया।

आर के नारायण का पुरस्कार और सम्म्मान

  • नारायण को 1968 में उनके उपन्यास ‘द गाइड’ के लिए साहित्य अकादमी के राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत किया गया।
  • भारत सरकार ने भी उन्हें ‘पद्मभूषण’ और ‘पद्मविभूषण’ से सम्मानित किया।
  • 1989 में साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राज्यसभा का मानद सदस्य चुना गया।

आर के नारायण के विचार

  1. हमारी संपत्ति हर शाम दरवाजे से बाहर निकलती है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि वो अगली सुबह वापस आ जाए।
  2. प्रदर्शन पहचान दिलाता है। पहचान से सम्मान आता है। सम्मान से शक्ति बढ़ती है। शक्ति मिलने पर विनम्रता और अनुग्रह का भाव रखना किसी संगठन की गरिमा को बढ़ाता है।
  3. पैसे की असली शक्ति इसे दान देने की शक्ति का होना है।
  4. हम ईश्वर में यकीन रखते हैं , बाकी सभी तथ्य जमा करते हैं।
  5. प्रगति अक्सर मन और मानसिकता के अंतर के बराबर होती है।
  6. मैं चाहता हूँ कि इनफ़ोसिस एक ऐसी जगह बने जहाँ विभिन्न लिंग , राष्ट्रीयता , जाति और धर्म के लोग तीव्र प्रतिस्पर्धा लेकिन अत्यंत सद्भाव , शिष्टाचार और गरिमा के वातावरण में एक साथ काम करें और दिन प्रतिदिन हमारे ग्राहकों के काम में अधिक से अधिक मूल्य जोड़ें।
  7. एक साफ अंतःकरण दुनिया का सबसे नर्म तकिया है.
  8. एक मुमकिन असंभावना एक निश्चित सम्भावना की तुलना में बेहतर है।
  9. जब संदेह में हों, तो बता दें।
  10. चरित्र + अवसर = सफलता

के.आर. नारायणन की मृत्यु

9 नवंबर 2005 को आर्मी रिसर्च एंड रेफरल हॉस्पिटल, नई दिल्ली में निमोनिया के कारण उनका निधन हो गया। उनका मकबरा दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू की शांति वन के बगल में बनाया गया था, जिसे एकता स्थल कहा जाता है।

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